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वार्द्धक्य और गार्हस्थ्य-जीवन

योगेन्द्र प्रसाद मिश्र (जे.पी. मिश्र)
पटना (बिहार)
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पति-पत्नी मिलकर जो जीवन जीते हैं,वह गार्हस्थ्य-जीवन कहलाता है। जाहिर है कि इसमें उन पर निर्भर उनके बच्चे आ ही जाएंगे। उनके वे बच्चे जो बड़े हो गए हैं और अपने पैरों पर खड़े हो गए हैं या बेटी की शादी होकर गृहवास बदल गया है,वे भले इस परिधि में नहीं आएँ। वैसे,आज के इस युग में अपने पैरों पर खड़े बच्चे माता-पिता से अलग रहने ही लगते हैं और बहुत मामलों में वे अपना अलग घर भी बना लेते हैं,तो माता-पिता को भी अलग रहने की मजबूरी हो जाती हैl अकेले रहकर वे अपना वार्द्धक्य-जीवन काटते हैं और अपनी स्थिति पर भीतर-ही-भीतर कटते रहते हैं। स्थिति तो यों हो जाती है कि-

आलीशान मकान है और भव्य उद्यान। रहनेवाले दो बचे,श्रीमती व श्रीमानll बेटा है इंग्लैंड में,बेटी है जापान। कितने खुश माँ-बाप हैं,घर जैसे श्मशानll' (पद्मश्री डॉ. शैलेन्द्रनाथ श्रीवास्तव) यही स्थिति आज अवकाश प्राप्त अधिकतर वयोवृद्धों की है। वार्द्धक्य प्राप्त पति-पत्नी एक-दूसरे के बहुत करीब हो जा रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह भय सता रहा है कि,नियति उन्हें एक-दूसरे से अलग नहीं कर दे,इसीलिए साथ वे छोड़ना नहीं चाहते। यह स्थिति एक कैदखाने-सी होती रही है। दोनों में से एक अकेले जाने में सक्षम है,तो भी दूसरे के चलते वे बाहर जा नहीं सकते। अगर दोनों में से कोई साथ छोड़ चुका है,तो भी वे किसी स्थिति में मन लगा नहीं सकते। एकाकीपन उन्हें खाए जाता है। आए-दिन परिचितों की मौत की खबर उन्हें डराती रहती है,लेकिन सबकी तो यही गति है- रोते जग की अनित्यता पर,सभी विश्व को छोड़ चले।
कुछ तो चढ़े चिता के रथ पर,कुछ कब्रों की ओर चले।
रुके न पल भर मित्र,पुत्र,माता से नाता तोड़ चले।
लैला रोती रही किन्तु,कितने मजनू मुँह मोड़ चलेl (दिनकर)
अब गार्हस्थ्य-जीवन के लिए वेद में क्या दिशा-निर्देश है,उस संग चलें-

`जैसे रथ-सवार हो चलने दूर देश,बनाया जाता है उत्तम-मार्ग।
वैसे उभय प्रशंसित जीवन,चले आत्म निर्धारित मोक्ष-मार्गll (ऋक्. १/११९/२)

`पुत्र-पौत्रों से व्यवहार में,रखते हैं जो विभेद परस्पर।
वे कैसे आशा रखते उनसे,अपने लिए सुअवसरll (ऋक्. १/१४७/१)

धर्मयुक्त कामों में रुचि रखने वाले,
शास्त्रवेत्ता,धर्मोपदेश करनेवाले।
शास्त्रानुकूल चलनेवाले,हैं सत्कार योग्य,
वृहस्पति गुणगान करनेवालेll (ऋक्. १/१९०/१)

दिन-रात प्रेरित करते मानव को उत्तम काम,
वस्त्र बुनते करघे पर ताना-बाना के समान।
वैसे ही हों स्त्री-पुरुष कान्तियुक्त जैसे उषाकाल,
हों वे प्रेमपूर्ण,हष्ट-पुष्ट,सक्षम,ऐश्वर्यवानll
(ऋक्. २/३/६)
तुम रथ में जुते दो अश्व,पहियों के समान,
एक-दूसरे से हो प्रेमयुक्त,करो श्रेष्ठ काम।
तुम स्त्री-पुरुष,करो एक-दूजे का सम्मान,
शोभायमान हो नर-मादा मैना पक्षी-समानll
(ऋक्. २/३९/२)
दानवीर और मधुभाषी जो होते हैं,
चिरकाल जरारहित यौवनयुक्त होते हैं।
जैसे यज्ञ समिधा दिशाएँ शुद्ध करतीं,
वैसे ही मानव से माता सम प्रेम पाते हैंll
(ऋक्. ५/४४/३)
जैसे धनुष पर चढ़ी डोरी से तीर छोड़ा जाता है,
वैसे ही विदुषी पत्नी पति का साथ देती है।
जैसे खींचे धनुष से तीर छोड़ विजय मिलती है,
वैसे ही पति-पत्नी को जीवन में जीत मिलती हैll (ऋक्. ६/७५/३) वार्द्धक्य का गार्हस्थ्य जीवन व्यक्ति और खासकर पति-पत्नी को अपने में समेट देता है,इसलिए एक-दूसरे का ख्याल रखना दोनों का कर्तव्य ही नहीं,दोनों की आवश्यकता हो जाती है। परिवार का विशिष्ट या प्रमुख की अपरिहार्यता को देखते हुए उसे परिवार और समाज के लोगों का मुख देख कर चलना होता है। जीवन ही समष्टि को अर्पित हो जाता है और उसी में सुख भी मिलता है। कुछ करते रहें ऐसा,लगे जो जीवन भर-
कल के सपने सच करने,रहे हम सदा तत्परl
जिस हाल में भी हम हों,चलें हम दोनों मिलकर-
होगा जरूर गरिमामय,जीवन का यह सफरll`

परिचय-योगेन्द्र प्रसाद मिश्र (जे.पी. मिश्र) का जन्म २२ जून १९३७ को ग्राम सनौर(जिला-गोड्डा,झारखण्ड) में हुआ। आपका वर्तमान में स्थाई पता बिहार राज्य के पटना जिले स्थित केसरीनगर है। कृषि से स्नातकोत्तर उत्तीर्ण श्री मिश्र को हिन्दी,संस्कृत व अंग्रेज़ी भाषा का ज्ञान है। इनका कार्यक्षेत्र-बैंक(मुख्य प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त) रहा है। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन सहित स्थानीय स्तर पर दशेक साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए होकर आप सामाजिक गतिविधि में सतत सक्रिय हैं। लेखन विधा-कविता,आलेख, अनुवाद(वेद के कतिपय मंत्रों का सरल हिन्दी पद्यानुवाद)है। अभी तक-सृजन की ओर (काव्य-संग्रह),कहानी विदेह जनपद की (अनुसर्जन),शब्द,संस्कृति और सृजन (आलेख-संकलन),वेदांश हिन्दी पद्यागम (पद्यानुवाद)एवं समर्पित-ग्रंथ सृजन पथिक (अमृतोत्सव पर) पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। सम्पादित में अभिनव हिन्दी गीता (कनाडावासी स्व. वेदानन्द ठाकुर अनूदित श्रीमद्भगवद्गीता के समश्लोकी हिन्दी पद्यानुवाद का उनकी मृत्यु के बाद,२००१), वेद-प्रवाह काव्य-संग्रह का नामकरण-सम्पादन-प्रकाशन (२००१)एवं डॉ. जितेन्द्र सहाय स्मृत्यंजलि आदि ८ पुस्तकों का भी सम्पादन किया है। आपने कई पत्र-पत्रिका का भी सम्पादन किया है। आपको प्राप्त सम्मान-पुरस्कार देखें तो कवि-अभिनन्दन (२००३,बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन), समन्वयश्री २००७ (भोपाल)एवं मानांजलि (बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन) प्रमुख हैं। वरिष्ठ सहित्यकार योगेन्द्र प्रसाद मिश्र की विशेष उपलब्धि-सांस्कृतिक अवसरों पर आशुकवि के रूप में काव्य-रचना,बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के समारोहों का मंच-संचालन करने सहित देशभर में हिन्दी गोष्ठियों में भाग लेना और दिए विषयों पर पत्र प्रस्तुत करना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-कार्य और कारण का अनुसंधान तथा विवेचन है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचन्द,जयशंकर प्रसाद,रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और मैथिलीशरण गुप्त है। आपके लिए प्रेरणापुंज-पं. जनार्दन मिश्र ‘परमेश’ तथा पं. बुद्धिनाथ झा ‘कैरव’ हैं। श्री मिश्र की विशेषज्ञता-सांस्कृतिक-काव्यों की समयानुसार रचना करना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“भारत जो विश्वगुरु रहा है,उसकी आज भी कोई राष्ट्रभाषा नहीं है। हिन्दी को राजभाषा की मान्यता तो मिली,पर वह शर्तों से बंधी है कि, जब तक राज्य का विधान मंडल,विधि द्वारा, अन्यथा उपबंध न करे तब तक राज्य के भीतर उन शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा, जिनके लिए उसका इस संविधान के प्रारंभ से ठीक पहले प्रयोग किया जा रहा था।”