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पूजा

बाबूलाल शर्मा
सिकंदरा(राजस्थान)
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पूजा-
करना पूजा ज्ञान की,मानस मान सुजान।
राष्ट्र गान से वन्दना,संसद वतन विधान।
संसद वतन विधान,पूज निज भारत माता।
सरिता सागर भानु,धरा शशि प्राकृत नाता।
शर्मा बाबू लाल,शीश चंदन रज धरना।
गुण मानवता सत्य,न्याय की पूजा करना।

थाली-
थाली जिसमें खा रहे,करे उसी में छेद।
करे परिश्रम बावरे,वृथा बहाए स्वेद।
वृथा बहाए स्वेद,ताकते राम भरोसे।
घर की मुर्गी दाल,पराये भात परोसे।
शर्मा,बाबू लाल,चाल चलते मतवाली।
घी,बूरे की मौज,लगे औरों की थाली।

बाती-
बाती घी या तेल से,रखती मानस मेल।
पहले जलती है स्वयं,पीछे घृत या तेल।
पीछे घृत या तेल,निभाती प्रीत मिताई।
दूध नीर-सा मेल,प्रीत की रीति दुहाई।
शर्मा,बाबू लाल,जले तब रात सुहाती।
रहे दीप का नाम,तेल घी जलती बाती।

आशा-
चातक-सी आशा रखो,मत तुम त्यागो धीर।
स्वाति बिंदु सम लक्ष्य भी,निश्चित मान प्रवीर।
निश्चित मान प्रवीर,पिपासा धारण कर ले।
करो परिश्रम कर्म,जोश तन-मन में भर ले।
शर्मा बाबू लाल,भूल मन नाम निराशा।
जाग्रत सपने देख,कर्म कर पूरित आशा।

उड़ना-
उड़ना देख विहंग का,मन में रहा विचार।
मन ऊँचा इनसे उड़े,मनुज देह लाचार।
मनुज देह लाचार,चाह है नभ में जाना।
सूरज तारे चंद्र,पहुँच कर कविता गाना।
शर्मा बाबू लाल,नेह बल सबसे जुड़ना।
धरती पर हो पाँव,नयन मन ऊँचे उड़ना।

खिलना-
खिलना चाहे हर कली,बनना सुंदर फूल।
तोड़ो मत उसको सखे,भ्रमर बनो अनुकूल।
भ्रमर बनो अनुकूल,सोच उद्धव-सी रखना।
देना उत्तम ज्ञान,दर्द कुछ मन का चखना।
शर्मा बाबू लाल,चाह मन सबसे मिलना।
संपद विपद समान,फूल जैसे नित खिलना।

होली-
होली होनी थी हुई,पर्व मने हर साल।
बेटी बनती होलिका,मरती मौत अकाल।
मरती मौत अकाल,कहे सब सुता बचाओ।
सच्चे कितने लोग,सत्यता जान बताओ।
शर्मा बाबू लाल,जले मत बेटी भोली।
खेल रंग संघर्ष,बचो बनने से होली।

साजन-
साजन सीमा पर चले,तकती विरहा राह।
देश प्रथम अपने लिए,कहूँ न तन मन आह।
कहूँ न तन मन आह,यही बस मेरी चाहत।
पहले रखना देश,हमारा प्यारा भारत।
करो न मेरा मोह,बचे भारत का सावन।
विजित बने जब देश,तभी घर आना साजन।

सजना-
सजना है मुझको सखी,कर अनूप श्रृंगार।
अमर सुहागिन मैं बनूं,शत्रु दलन अंगार।
शत्रु दलन अंगार,देश हित मुझे सजाओ।
सीमा पर अरि घात,युद्ध के साज बजाओ।
शर्मा बाबू लाल,सजन मुश्किल मम बचना।
लक्ष्मी बाई याद,उन्हीं की जैसे सजना।

डोरी-
डोरी रेशम सूत की,बनती रही सदैव।
जैसी जिसकी भावना,हो उपयोग तथैव।
हो उपयोग तथैव,प्रीत के बंध सुहावन।
बुनते फंदा जाल,करे कुछ काज अपावन।
शर्मा बाबू लाल,अन्न हित बनती बोरी।
भले भलाई बंध,नेह मय राखी डोरी।

परिचय : बाबूलाल शर्मा का साहित्यिक उपनाम-बौहरा हैl आपकी जन्मतिथि-१ मई १९६९ तथा जन्म स्थान-सिकन्दरा (दौसा) हैl वर्तमान में सिकन्दरा में ही आपका आशियाना हैl राजस्थान राज्य के सिकन्दरा शहर से रिश्ता रखने वाले श्री शर्मा की शिक्षा-एम.ए. और बी.एड. हैl आपका कार्यक्षेत्र-अध्यापन(राजकीय सेवा) का हैl सामाजिक क्षेत्र में आप `बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ` अभियान एवं सामाजिक सुधार के लिए सक्रिय रहते हैंl लेखन विधा में कविता,कहानी तथा उपन्यास लिखते हैंl शिक्षा एवं साक्षरता के क्षेत्र में आपको पुरस्कृत किया गया हैl आपकी नजर में लेखन का उद्देश्य-विद्यार्थी-बेटियों के हितार्थ,हिन्दी सेवा एवं स्वान्तः सुखायः हैl

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