वाराणसी (उप्र)।
हमारी भाषा में ध्वनियों का भी अर्थ होता है। मेरी रचनाओं में सिर्फ ‘मैं’ नहीं है, ‘हम’ है। हमारे पुरखों द्वारा वाचिक परंपरा से हम तक पहुँचाया गया ज्ञान है। प्रकृति हमें सिखाती है कि हमारे बीच कुछ भी सुंदर, असुंदर नहीं है। पर्यावरण शब्द नया है। आदिवासी गीतों में आप यह शब्द नहीं पाएंगे।
प्रसिद्ध आदिवासी चिंतक एवं कवयित्री नंदना टेटे ने यह बात ‘विश्व आदिवासी दिवस’ के उपलक्ष्य में हिन्दी विभाग (भू) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में कही। उन्होंने अपनी कविता ‘बेख़ौफ नदी’ का काव्य पाठ भी किया। १३ अगस्त को काशी हिंदू विवि के हिन्दी विभाग द्वारा यह आयोजन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल सभागार में किया गया। हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष श्रद्धा सिंह ने कहा कि हमारे देश का वास्तविक विकास तभी होगा, जब आदिवासी शिल्प, कला, संस्कृति मुख्यधारा में आएगी।
विशिष्ट वक्ता अश्विनी पंकज कुमार ने कहा कि हमें अपनी स्वाभाविक वृत्ति को कृत्रिम बनाने से बचना होगा।
हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य राज कुमार मीणा ने कार्यक्रम की प्रतावना रखी। संचालन विभाग की शोधार्थी काजल कुमारी ने किया।