दिल्ली।
प्रेमचंद लिखित ‘सोजे वतन’ कहानी-संग्रह भारतीयता और राष्ट्रीय चेतना की भावना से ओत-प्रोत है। प्रेमचंद जन्मजात देशभक्त थे। ‘सोजे वतन’ में आजादी का मंत्र प्रस्तुत हुआ है।
प्रगतिशील आलोचकों ने ‘गोदान’, ‘कफन’ या ‘पूस की रात’ को तो पाठ्यक्रम में स्थान दिया, लेकिन ‘सोजे वतन’ को उपेक्षित रखा।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद् से संबद्ध इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती द्वारा शुक्रवार को प्रवासी भवन नई दिल्ली) में प्रेमचंद जयंती पर उनकी पुस्तक ‘सोजे वतन’ पर आयोजित चर्चा में यह विचार सुपरिचित लेखक डॉ. राजकुमार उपाध्याय ‘मणि’ ने व्यक्त किए।
लेखक विनय विक्रम सिंह ने कहा कि ‘सोजे वतन’ प्रेमचंद की आरंभिक कहानियां हैं। इसमें राष्ट्र प्रथम की भावना पर जोर दिया गया है। भाषायी दृष्टि से इसमें विविधता है। युवा लेखक अविरल अभिलाष ने कहा कि ‘सोजे वतन’ पुस्तक भौतिकवादी धारणा को ध्वस्त कर राष्ट्रप्रेम को प्रतिष्ठित करती है। यह बताती है कि राष्ट्रप्रेम किसी राजनीतिक नारों से नहीं, अपितु सच्चे बलिदान से प्रखर होता है।
हिन्दी अकादमी, दिल्ली के पूर्व उपसचिव ऋषि कुमार शर्मा ने कहा कि ‘सोजे वतन’ की कहानियों की विशेषता यह है कि वे एक पारंपरिक प्रेम कहानी से शुरू होती हैं, लेकिन अंत में देशभक्ति की कहानी में परिवर्तित हो जाती हैं।
पुस्तक-चर्चा का संचालन करते हुए विकास आनंद ने कहा कि १९०८ में प्रकाशित ‘सोजे वतन’ एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसमें अपनी मातृभूमि की मिट्टी और जड़ों के प्रति अगाध प्रेम को दर्शाया गया है।
कार्यक्रम परिषद् के केंद्रीय कार्यालय सचिव संजीव सिन्हा, डॉ. विवेक विश्वास एवं अभय त्रिपाठी ने भी सहभागिता की।