सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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जन मन का भाव हिन्दी (हिन्दी दिवस विशेष)…
शब्दों के शाश्वत आकाश में,
जब संवेदनाओं का सूर्य उदित होता है
तब किसी सरिता-सी कल-कल करती,
एक भाषा हृदय में अवतरित होती है—हिंदी।
यह केवल वर्णों का विन्यास नहीं,
निःशब्द अनुभूतियों का मुखरित स्पंदन है;
यह केवल संवाद का सेतु नहीं,
संस्कृति के चिरंतन संस्कारों का
अक्षुण्ण आलोक है।
इसकी ध्वनियों में,
माटी की सौंधी गंध है
लोक गीतों की अनुगूँज है,
माँ की ममता का मृदुल स्पर्श है
और ऋषियों की तपःपूत वाणी का
गंभीर ओज भी।
देवनागरी की सुव्यवस्थित पंक्तियों में,
जब विचार आकार ग्रहण करते हैं
तो शब्द मात्र नहीं रहते—
वे युगबोध के संवाहक,
इतिहास के साक्षी
और भविष्य के पथ-प्रदीप बन जाते हैं।
हिंदी ने,
विरह को करुणा दी
श्रृंगार को माधुर्य दिया,
वीरता को हुंकार दी
और जन-मन की पीड़ा को,
अभिव्यक्ति का स्वत्व दिया।
यह तुलसी की भक्ति में राममयी हुई,
कबीर की वाणी में निर्भीक हुई
सूर के पदों में वात्सल्यमयी हुई,
प्रेमचंद की लेखनी में
लोकजीवन का यथार्थ बनी,
और निराला के स्वरों में
विद्रोह का शंखनाद।
हिंदी दिवस केवल उत्सव नहीं,
अपने भाषिक अस्तित्व के प्रति
आत्मबोध का अवसर है।
आइए, हिंदी को केवल हिंदी,
न बना हिंद की भाषा बनाएँ
एक दिवस की औपचारिकता
नहीं बोल-चाल का माध्यम बनाएँ;
इसे अपने चिंतन की चेतना,
अपने व्यवहार की गरिमा
सृजन की संवाहिका,
और हृदय का विश्वास बनाएँ।
माँ की लोरी में ममता का संगीत,
किसान की वाणी में फ़सल का गीत बनाएँ
किसी के मन बसा प्यारा मनमीत,
तथा कवि के हृदय के भाव बनाएँ।
‘हिंदी’—
हमारी अभिव्यक्ति ही नहीं,
हमारी अस्मिता का अक्षय आलोक है।
यह केवल जीवित नहीं रहेगी,
निरंतर सृजित होती रहेगी॥