बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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जन मन का भाव हिन्दी (हिन्दी दिवस विशेष)…
‘हिंदी’,
मेरे लिए किसी कैलेंडर पर दर्ज
एक दिन का नाम नहीं है।
वह उस क्षण से मेरे भीतर है,
जब मैंने दुनिया को
किसी अर्थ के बिना,
पहली बार देखा था।
माँ की आवाज़ में,
मैंने भाषा का पहला स्पर्श जाना
पिता की बातों में,
जीवन के अर्थ समझे
दादी की कहानियों में,
बीते हुए समय को सुना।
मेरी हिंदी,
किसी व्याकरण की किताब से पहले
मेरे घर में जन्मी थी।
वह आँगन में बोली जाती थी,
रसोई में सुनाई देती थी
खेत से लौटते पिता के चेहरे पर,
थकान के साथ दिखाई देती थी,
और माँ के उस छोटे से वाक्य में
जिसमें वह पूछती थी-
दिन कैसा रहा ?
यही भाषा,
मेरे सुख में मेरे साथ रही
और मेरे दुःख में,
मेरे पास बैठी रही।
मैंने जब पहली बार,
अपने मन की कोई बात
किसी से कहने की कोशिश की,
तो शब्दों से पहले
हिंदी मेरे भीतर थी।
आज ‘हिंदी दिवस’ है,
हम हिंदी के लिए
सभाएँ करेंगे,
भाषण होंगे
कविताएँ पढ़ी जाएँगी,
हिंदी के महत्व पर
बहुत कुछ कहा जाएगा।
लेकिन, शायद
हिंदी को सबसे अधिक आवश्यकता
इन समारोहों की नहीं,
हमारे व्यवहार की है।
वह तब जीवित रहेगी,
जब हम अपने घर में
बच्चों से बात करते हुए,
अपनी भाषा को कमतर नहीं समझेंगे।
वह तब आगे बढ़ेगी,
जब विज्ञान की बात भी
हिंदी में सहजता से की जाएगी,
जब तकनीक के नए शब्दों से
भय नहीं होगा,
जब ज्ञान की दुनिया में
हिंदी केवल अनुवाद बनकर नहीं,
अपने विचारों के साथ उपस्थित होगी।
हिंदी का भविष्य,
केवल साहित्यकारों के हाथ में नहीं है
वह शिक्षक के पास है,
किसान के पास है
विद्यार्थी के पास है,
बाज़ार में काम करने वाले व्यक्ति के पास है
उस स्त्री के पास है,
जो अपने बच्चों को
पहली बार दुनिया समझाती है।
वह उस बच्चे के पास भी है,
जो अपनी कॉपी में
पहला शब्द लिख रहा है।
हमें हिंदी को,
किसी दूसरी भाषा के सामने
खड़ा करने की आवश्यकता नहीं,
भाषाएँ एक-दूसरे से लड़ती नहीं हैं
वे मनुष्य के अनुभव को,
अलग-अलग रास्तों से
अभिव्यक्ति देती हैं।
दूसरी भाषाएँ सीखना
हमारी शक्ति है,
लेकिन अपनी भाषा से दूर होना
अपनी स्मृतियों से दूर होना है।
हिंदी में
हमारे गाँव हैं,
हमारे शहर हैं
हमारी लोक-स्मृतियाँ हैं,
हमारी माताएँ हैं
हमारे संघर्ष हैं,
हमारी असंख्य अनकही कहानियाँ हैं।
इसलिए हिंदी को,
सिर्फ बचाने की बात न करें
उसे पढ़ें,
उसे लिखें
उसमें सोचें,
उसमें अपने बच्चों से बात करें
उसमें अपने समय की समस्याएँ लिखें,
उसमें भविष्य की कल्पना करें।
क्योंकि कोई भाषा,
स्मारक बनाकर जीवित नहीं रहती
वह मनुष्य के जीवन में,
चलती हुई दिखाई देती है।
मेरी हिंदी भी,
किसी पुस्तक के पन्ने में बंद नहीं है
वह मेरे घर में है,
मेरी स्मृतियों में है
मेरे प्रश्नों में है,
मेरे सपनों में है।
और जब तक,
मैं अपने मन की बात
अपनी सहज भाषा में
कह पाऊँगी।
तब तक,
हिंदी मेरे भीतर
जीवित रहेगी॥