डॉ. शैलेश शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
***********************************
एक समय था जब अपना नाम लिख लेना ही साक्षरता मानी जाती थी। फिर कम्प्यूटर चलाना सीखना साक्षरता बन गया। आज साक्षरता का मतलब फिर बदल रहा है। अब यह देखना जरूरी है, कि क्या हमारा नागरिक ‘कृत्रिम बुद्धिमत्ता’ (ए.आई.) को समझता है, उसका सही उपयोग कर पाता है और उसके खतरों को पहचान पाता है। इसी समझ को ए.आई. साक्षरता कहते हैं। भारत जैसे बड़े देश के लिए यह केवल तकनीक का सवाल नहीं है, रोजगार, शिक्षा और लोकतंत्र का भी सवाल है। इस सवाल का जवाब खोजने के लिए सरकार ने एक बड़ी योजना शुरू की है। ७ मार्च २०२४ को इंडिया ए.आई. मिशन को मंजूरी दी गई। इसके लिए ५ साल में १०,३७१.९२ करोड़ रुपए का बजट रखा गया। इसका मकसद है, कि देश में ए.आई. के लिए कम्प्यूटर की ताकत, डेटा और प्रशिक्षण की सुविधा सबको मिल सके। इस योजना के तहत दिसंबर २०२५ तक ३८ हजार ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट लगाने की बात कही गई है, ताकि छोटे स्टार्ट-अप और महाविद्यालयों के छात्र भी बड़े ए.आई. मॉडल चला सकें। बिना कम्प्यूटर की ताकत के ए.आई. साक्षरता किताबों तक ही सीमित रह जाएगी।
पैसे की बात करें तो बजट २०२५-२६ में इस मिशन को २ हजार करोड़ ₹ दिए गए, जिसे उस समय तक का सबसे बड़ा समर्थन कहा गया, लेकिन २०२६-२७ में यह रकम घटकर १ हजार करोड़ ₹ रह गई। इससे सवाल उठता है कि क्या हम ए.आई. को लगातार चलने वाला निवेश मान रहे हैं या साल दर साल बदलने वाली योजना। विद्यालयों में जो हो रहा है, वह उम्मीद देता है। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-२०२०’ ने कहा कि बच्चों को जल्दी ए.आई. से परिचित कराया जाए। इसी के तहत केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने कक्षा ६ के लिए १५ घंटे का ए.आई. मॉड्यूल शुरू किया है और कक्षा ९ से १२ के लिए वैकल्पिक विषय बनाया है, साथ में ‘युवाई’ कार्यक्रम चल रहा है, जिसमें बच्चों को सिखाया जाता है कि खेती, पर्यावरण या स्मार्ट शहर की समस्याओं के लिए ए.आई. से कैसे समाधान बनाया जाए। जब बच्चा खेत की समस्या के लिए ए.आई. मॉडल सोचता है, तब असली साक्षरता शुरू होती है।
बड़ों के लिए भी रास्ते खुले हैं। ‘फ्यूचर स्किल्स प्राइम’ राष्ट्रीय कार्यक्रम है, जहाँ अगस्त २०२५ तक १८.५६ लाख से ज्यादा लोगों ने पंजीकरण कराया और ३.३ लाख लोगों ने ए.आई. का प्रमाणन पूरा किया। इसके अलावा युवा ए.आई. फॉर ऑल’ नाम से मुफ्त कोर्स है, जिसका लक्ष्य १ करोड़ नागरिकों को बुनियादी जानकारी देना है। यह पूरा करने पर भारत सरकार का प्रमाण-पत्र मिलता है।
एक अच्छी कोशिश ‘कौशल रथ’ भी है। १० फरवरी २०२६ को इंडिया ए.आई. ने एक मोबाइल वैन को रवाना किया, जो छोटे शहरों और गांवों में जाकर छात्रों-शिक्षकों को ए.आई. के बारे में बताएगी। यह सोच सही है कि केवल ऑनलाइन पाठ्यक्रम से काम नहीं चलेगा, गाँव तक जाना होगा। सिर्फ चलाना सीखना ही काफी नहीं है, सही तरीके से चलाना भी सीखना है। ए.आई. साक्षरता बिना नैतिकता के केवल नई निरक्षरता को जन्म देगी।
अब सवाल पर वापस आते हैं – क्या ये कदम पर्याप्त हैं ? इरादे के स्तर पर हाँ, कदम सही दिशा में हैं। इतना बड़ा मिशन, विद्यालयों में ए.आई., १ करोड़ लोगों को मुफ्त प्रशिक्षण का लक्ष्य, ये सब पहले कभी नहीं हुआ, लेकिन पैमाने पर देखें तो कमी दिखती है। हमारे देश में ५० करोड़ से ज्यादा लोग काम करने योग्य उम्र में हैं, उनके सामने १८ लाख पंजीकरण बहुत छोटा आंकड़ा है। दूसरा, भाषा की दीवार है। ज्यादातर अच्छे कोर्स अभी भी अंग्रेजी में हैं। जब तक एक किसान अपनी भाषा में सवाल नहीं पूछ पाएगा, तब तक साक्षरता अधूरी है। तीसरा, शिक्षकों की कमी है। ए.आई. पढ़ाने वाले शिक्षक हर शाला में नहीं हैं। इसलिए जरूरत है कि बजट लगातार बढ़े और स्थिर रहे, हर ए.आई. कोर्स २२ भारतीय भाषाओं में स्थानीय उदाहरणों के साथ बने, और ए.आई. साक्षरता में सिर्फ कोडिंग नहीं, बल्कि डेटा की निजता, गलत खबर की पहचान और पक्षपात को समझना भी सिखाया जाए। भारत ने नींव रख दी है, दीवारें उठ रही हैं, पर छत अभी बननी बाकी है। अगर हम यह कर पाए, तो भारत केवल ए.आई. इस्तेमाल करने वाला देश नहीं, बल्कि जिम्मेदार ए.आई. में दुनिया को रास्ता दिखाने वाला देश बनेगा।