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कबीर केवल देश में ही नहीं, अपितु विश्व स्तर पर व्याप्त

गोष्ठी…

इंदौर (मप्र)।

कबीर तब तक जिंदा रहेंगे, जब तक स्त्रियों के कंठ में श्वास है। जिन संतों ने ज्ञान परंपरा चलाई, वे कभी पढ़े-लिखे नहीं रहे और न ही किसी विश्वविद्यालय गए, किंतु संतों ने कभी अपना कर्म और धर्म नहीं छोड़ा। कबीर केवल देश में ही नहीं, अपितु विश्व स्तर पर व्याप्त हैं।
       मुख्य अतिथि सुरेश पटेल ने ‘मोको कहां ढूंढे रे बन्दे’ विषय पर वामा साहित्य मंच की मासिक गोष्ठी-बैठक में भक्तिकालीन संतों और कवियों के दोहों को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए यह बात कही। मंच की प्रचार प्रमुख सपना साहू ‘स्वप्निल’ ने बताया कि कबीर जन-जागरूकता आंदोलन से जुड़े सुरेश पटेल के मुख्य आतिथ्य में इस कार्यक्रम का आरंभ हुआ। प्रतिमा जाट द्वारा प्रस्तुत सरस्वती स्तुति और कबीर पंथ की गायिका अंजना सक्सेना ने मधुर भजनों की प्रस्तुति दी। इस अवसर पर संस्था उपाध्यक्ष वैजयंती दाते ने शब्द पुष्पों से उपस्थित जन का अभिवादन किया। वरिष्ठ पत्रकार क्रांति चतुर्वेदी और अनिल कर्मा ने आकर मंच का सम्मान बढ़ाया।
​मंच से जुड़ी लेखिका श्रुति शर्मा ने ‘माला फेरत युग गया’, डॉ. भावना बर्वे ने ‘काठ की पुतली’, मृदुला शर्मा ने ‘हमन है इश्क मस्ताना’, सृष्टि उपाध्याय ने ‘बुरा जो देखन मैं चला’ तथा माधवी तारे ने ‘मन लाग्यो यार फकीरी में’ दोहों को विवेचित किया।
    ​आयोजन की संयोजक कविता अर्गल एवं अवंति श्रीवास्तव रहीं। सूत्रधार की भूमिका निधि जैन ने निभाई। आभार अनुपमा गुप्ता ने व्यक्त किया।