अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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‘नीट’ विवाद-आंदोलन…
भारत के लिए कहा जाता है कि यहाँ युवा ही भविष्य है, पर ‘नीट’, पेपर लीक और आंदोलनों के बीच सबसे बड़ा सवाल है कि – “क्या मेहनत अब भी सबसे बड़ा आधार है ?”
यह कहना तर्कसंगत है, कि भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं केवल एक परीक्षा नहीं, बल्कि लाखों छोटे-बड़े परिवारों के वर्षों के सपनों का आधार होती हैं। १ विद्यार्थी ३-४ साल तक दिन-रात पढ़ाई करता है। माता-पिता अपनी बचत, गहने और कभी-कभी जमीन तक बेचकर कोचिंग की क़ीमत चुकाते हैं। घर की हर उम्मीद एक परीक्षा से जुड़ जाती है, कि कल को बेहतरीन परिणाम आएँगे और उनकी बिटिया या बेटा कलेक्टर, पुलिस अधिकारी, सरकारी वकील, पटवारी और चिकित्सक आदि बनकर नाम रोशन करेगा। ऐसे में जब परीक्षा के बाद पेपर लीक (आउट) की बात सामने आती है या पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, तो हर मेहनती विद्यार्थी का उस मेहनत पर से विश्वास टूटता है। उसकी आँख में जो आँसू होते हैं, उसमें असंतोष होता है, पीड़ा भी एवं व्यवस्था के प्रति घोर आक्रोश भी।
‘नीट’ को लेकर हुए विवाद और उसके बाद देशभर में उठे छात्र आंदोलनों ने इस बार भी यह स्पष्ट कर दिया है कि देश की परीक्षा व्यवस्था एक गंभीर चुनौती के दौर से गुजर रही है। यह बहस किसी एक सरकार, एक संस्था या एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। हर विद्यार्थी का केंद्र एवं संबंधित एजेंसी से सीधा सवाल है, कि-क्या इस देश में ईमानदारी से पढ़ने वाले छात्र को यह भरोसा मिलेगा कि उसकी मेहनत का सही मूल्यांकन होगा ? उसके ईमानदार परिणाम की ईमानदारी से जिम्मेदारी कौन लेगा ?
इस पूरी व्यवस्था में खास बात यह है कि सबसे बड़ी कीमत वही विद्यार्थी चुकाता है, जिसने कोई गलती नहीं की। पेपर बताने वाला गिरोह पैसा कमाता है, लापरवाह अधिकारी अपनी नौकरी बचाने की कोशिश करता है और राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, लेकिन सबसे बड़ा नुकसान उस छात्र का होता है, जिसने न तो नियम तोड़े और न कोई अपराध किया।
आप जरा कल्पना कीजिए उस विद्यार्थी की, जिसने रोज़ १०-१२ घंटे पढ़ाई की, सामाजिक जीवन छोड़ दिया, त्योहारों से दूरी बनाई और एक ही लक्ष्य रखा-नीट में सफलता। वो पूरे जतन से परीक्षा देकर बाहर निकला तो लगा कि संघर्ष पूरा हुआ, लेकिन कुछ दिनों बाद मालूम पड़ता है कि पर्चा लीक हो गया, जांच होगी, परिणाम पर सवाल हैं या दोबारा परीक्षा की संभावना है। ऐसा सुनकर उस क्षण से आगे तक उसके मन पर क्या बीतती होगी, क्या उस युवा वर्ग का आत्म विश्वास नहीं बिखरेगा ?
अब दूसरे पहलू को भी देखिए-देश में ऐसे हजारों छात्र हैं जो आर्थिक दबाव, मानसिक तनाव और भविष्य की अनिश्चितता के बीच तैयारी करते हैं। उनके लिए हर अतिरिक्त परीक्षा, हर देरी और हर विवाद केवल एक समाचार नहीं, बल्कि जीवन का सबसे कठिन बोझ बन जाता है, क्योंकि हर इंसान की परिस्थिति समान नहीं होती है।
इस सबके विरोध में वर्तमान परिवेश में जन आंदोलन जरूरी है, लेकिन स्थायी समाधान उससे भी अधिक जरूरी है। लोकतंत्र में आम आदमी की तरह छात्रों को भी अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। प्रादेशिक-राष्ट्रीय स्तर पर किए गए शांतिपूर्ण आंदोलन कई बार सुधारों की शुरुआत बनते हैं, पर यह भी सच है कि यदि हर वर्ष किसी बड़ी परीक्षा के बाद सड़कें ही न्याय का माध्यम बन जाएं, तो यह व्यवस्था की कमजोरी का संकेत है।
इस स्थिति में हमें ऐसी परीक्षा प्रणाली चाहिए, जिसमें छात्र को अदालत, आंदोलन और मीडिया के भरोसे न रहना पड़े। उसकी पहली और अंतिम उम्मीद परीक्षा प्रणाली ही होनी चाहिए। उसका गुम हो चुका भरोसा लौटाने की आवश्यकता है, जो किसी पारदर्शी व्यवस्था और सख़्ती से ही लौटता है।
कहना गलत नहीं होगा कि सरकार किसी भी दल की हो, और शिक्षा मंत्री कोई भी हो, उसके इस्तीफे से व्यवस्था नहीं बदलेगी। सुधार तब होगा, जब व्यवस्था में बदलाव किया जाएगा। यानी सबसे पहले परीक्षा-सुरक्षा को पूरी तरह तकनीक आधारित बनाया जाए। प्रश्न-पत्रों का बहुस्तरीय एन्क्रिप्शन, अंतिम समय पर सुरक्षित डिजिटल वितरण, हर चरण की डिजिटल ट्रैकिंग और साइबर सुरक्षा को अनिवार्य बनाया जाए, तभी विद्यार्थी को संतुष्टि मिलेगी।
ऐसे ही पर्चा लीक को केवल आपराधिक मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व का अपराध माना जाए। ऐसे मामलों की जांच अधिकतम ३० दिन में पूरी हो और दोषियों को समयबद्ध न्याय मिले। कहने का मतलब है कि वर्षों तक चलने वाली जांच का बोझ छात्रों पर नहीं पड़ना चाहिए। तीसरी बात-परीक्षा कराने वाली संस्थाओं की जवाबदेही स्पष्ट हो। यदि कोई भी लापरवाही सिद्ध होती है, तो केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई न हो, वरन निर्णायक अधिकारियों की भी व्यक्तिगत जिम्मेदारी तय होनी चाहिए, क्योंकि जवाबदेही जितनी ऊपर होगी, सुधार उतने प्रभावी होंगे।
इसी तरह, प्रत्येक राष्ट्रीय परीक्षा के लिए एक स्वतंत्र ‘परीक्षा सत्यनिष्ठा आयोग’ बनाया जा सकता है, जो परीक्षा से पहले सुरक्षा ऑडिट, परीक्षा के दौरान निगरानी और परीक्षा के बाद शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा करे। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और विवाद कम होंगे।
इस बात को फिर से दिल से समझने की जरूरत है कि देश की सबसे बड़ी पूंजी उसके युवा हैं। यदि एक प्रतिभाशाली छात्र यह सोचने लगे, कि मेहनत से अधिक व्यवस्था की खामियाँ निर्णायक हैं, तो यह किसी भी राष्ट्र के लिए चिंता का विषय है।
‘नीट’ विवाद बनाम आंदोलन ने हमें केवल एक समस्या नहीं दिखाई, बल्कि कड़ी चेतावनी भी दी है। अब यह तय करना होगा, कि हर वर्ष नए विवादों-समस्या का इंतजार किया जाएगा या ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें परचा लीक अपवाद हो, नियम नहीं।
सरकार, मंत्री एवं एजेंसी के जिम्मेदारों को समझना पड़ेगा या सर्वोच्च न्यायालय उन्हें आदेश से समझाए कि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य केवल परीक्षा कराना नहीं, बल्कि हर प्रतिभा के साथ पूरा न्याय करना है। जिस दिन हर विद्यार्थी परीक्षा केंद्र से यह विश्वास लेकर लौटेगा, कि उसकी मेहनत ही उसकी सफलता तय करेगी, उसी दिन यह लड़ाई वास्तव में जीती जाएगी। आंदोलन एवं राजनीति का जोर-शोर तो कुछ दिनों में शांत हो जाएगा, किंतु आज के विद्यार्थियों के मन में पैदा हुआ अविश्वास वर्षों तक रह सकता है। इसलिए अब समय आरोप तय करने का नहीं, कड़े कानून बनाने का नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने और निभाने का है, जिसमें किसी भी छात्र को अपनी ईमानदारी की कीमत न चुकानी पड़े। अर्थात प्रश्न-पत्र लीक नहीं हों, और हो जाए तो जिम्मेदार की जिम्मेदारी तत्काल तय करके सख्त सजा दी जाए।