राधा गोयल
नई दिल्ली
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ज़िंदगी ने कदम-कदम पर इम्तिहान लिया। इतने कठिन इम्तिहान लिए, कि आज सोचती हूँ तो आश्चर्य होता है कि किस तरह से उन सब पर विजय प्राप्त की। कदम-कदम पर चुनौतियाँ आईं।
एक ऐसी लड़की… जिसके मायके में हर तरह की सुविधाएँ थीं… खाने-पीने की कोई तंगी नहीं थी। बहुत बड़ा घर था… उसका विवाह एक ऐसे परिवार में हुआ, जहाँ सुविधाओं का बेहद अभाव था। खाने वाले १२ लोग और कमाने वाला केवल १…। सुबह ट्यूशन पढ़ाने जाना… दिन में नौकरी… शाम को फिर ट्यूशन पढ़ाने जाना और रात को १२ बजे तक घर लौटना। मेरी शादी के फौरन बाद ही बड़े देवर की नौकरी लगी। उसने भी कोई कम मेहनत नहीं की। पार्लियामेंट हाउस में नौकरी लगी। वेतन ढाई सौ रुपए था। वह ओवरटाइम करता था जिससे २०० ₹ अतिरिक्त मिल जाते थे। उनके ऑफिस में एक तरह से कॉन्ट्रैक्ट पर काम होता था। ऐसा नहीं है कि दिन में कुछ ना करो और शाम को ओवर टाइम काम करो। बाकायदा दिन में भी २० पृष्ठ टाइप करने के लिए दिए जाते थे। टाइपराइटर से टाइप करने होते थे। एक शब्द भी गलत हो गया तो दोबारा टाइप करो। सरकारी नौकरी से पहले वह लोहा भवन में नौकरी करता था।
बड़े मुश्किल हालात थे। घर में आने-जाने वालों का जमावड़ा लगा रहता था। वह घर कम और सराय ज्यादा लगता था। पति एलएनजेपी में नौकरी करते थे। यदि कोई रिश्तेदार गंभीर बीमारी में दिखाने आता था, तो सबके लिए हमारे घर से ही खाना बन कर जाता था और वे लोग हमारे घर ही रहते थे। उन सबका खाना बनाना, बर्तन साफ करना, कपड़े धोना। आज सोचती हूँ तो आश्चर्य भी होता है। और जब पूरे रिश्तेदारों की बेहद तारीफ मिलती है, तो खुशी भी होती है, लेकिन यह तारीफ मुझे ऐसे ही नहीं मिली। उसके लिए न जाने मैंने कितने त्याग किए, कितने अरमानों का गला घोंटा और कितने जुल्म सहे, क्योंकि कभी-कभी अपनों को ही अपनों की तारीफ बर्दाश्त नहीं होती और वह इस हद तक आपका शोषण करते हैं कि आप मरणासन्न स्थिति तक पहुँच जाओ। ऐसा नहीं है कि मैं कभी टूटी नहीं। कई बार टूटी। टूट-टूट कर जुड़ी। अपने ऊपर हुए जुल्मों को पति ko

कभी नहीं बताया, क्योंकि मैंने सोच लिया था कि मैं इस चुनौती का मुकाबला करके दिखाऊँगी। वैसे, भी मेरी बचपन से ही एक इच्छा थी कि मैं एक ऐसा गाँव बसाऊँ, जहाँ नगर जैसी सुविधाएँ हों। सच कहूँ तो मेरा ससुराल किसी गाँव से कम नहीं था।
वास्तव में जीवन जीना एक कला है, पर यह कला हर किसी को नसीब नहीं होती। कोई छोटी-छोटी मुसीबतों के आने पर ही घबरा जाता है। यहाँ तक कि आत्महत्या जैसा कदम उठा लेता है तो कोई बड़ी से बड़ी समस्या आने पर भी उस समस्या में से कोई समाधान ढूँढ लेता है। सच्चाई तो यह है, कि समस्या बड़ी नहीं होती, बस उसे बड़ी समझ लेते हैं। यह अपने ऊपर है। कोई समस्याओं से घबरा जाता है, तो कोई उसी में से अवसर ढूँढ लेता है। न जाने ज़िंदगी में कितनी बार बहुत बड़ी-बड़ी समस्याएं आईं।बिना शिकायत किए सबका डटकर सामना किया।
सबकी ज़िंदगी में खुशियों के रंग भरने के लिए अपनी इच्छाओं को ताक पर रखना पड़ता है। बहुत कुछ खोना पड़ता है।
अजीब खेल है उस परमात्मा का, लिखता भी वही है, मिटाता भी वही है
भटकाता है तो राह दिखाता भी वही है,
उलझाता भी वही है, सुलझाता भी वही है
जिंदगी की मुश्किल घड़ी में, दिखता भी नहीं मगर
साथ देता भी वही है।