नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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है विश्वास कि न टूटेगा मेरा, यह विश्वास,
सदा रहे हैं, सदा रहेंगे, श्रीकृष्ण मेरे पास।
मेरी रक्षा वही करेंगे, संतान मैं जिसकी,
हूँ पहचान मैं जिसकी
वो पालक हैं प्राणी,
वो स्वामी, मैं दासी।
राधे-राधे बोल, राधे-राधे बोल दासी,
सत्य कभी न जान सका, जिनका मन काली-काली
मारने वाले से बढ़कर है बचाने वाला,
मर के अमर हैं गुरु हरि।
जिनकी हर साँस में बसे हरि,
कृष्ण बोल, कृष्ण बोल, कृष्ण-कृष्ण बोल हरि।
मैं पुत्र, मेरा पिता कृष्ण,
मेरा कृष्ण, मेरा सर्वत्र वही।
वही बुद्धिमान, वही ज्ञानवान, दानवान वही,
वही चालक, वही पालक, जिसने यह भुवन रचा
मन से चिंतन जो करता, योगक्षेम वहन करता वही,
जो नहीं मिला उसे देता, जो मिला उसकी रक्षा करता वही।
विचित्र पापी हूँ मैं, आश्चर्यजनक रूप से पतित हूँ मैं ही,
माया का अधिकार सदा से ही
काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, अहंकार दिल में बसे रहते,
माया जाएगी, तभी कृपा हो गुरु की कभी।
अंतरमन शुद्ध नहीं होगा, कृष्ण आएँगे मन में नहीं,
मन शुद्ध करना है। कीर्तन-नाम-जाप हो सदा।
गुरु हों श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ तभी,
उनकी शरण ग्रहण कर, तभी कल्याण होगा॥