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जनवादी कलमकार मुंशी प्रेमचंद

प्रो.डॉ. शरद नारायण खरे
मंडला(मध्यप्रदेश)
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मर्म रचयिता (मुंशी प्रेमचंद विशेष)….

प्रेमचंद की लेखनी, जन-जन की आवाज़।
सबकी पीड़ा के बने, जो उस युग में साज़॥

हर निर्धन की वेदना, बनी कलम का सार।
प्रेमचंद की दिव्यता, बनी प्रखर उजियार॥

लिखीं कथाएँ अनगिनत, उपन्यास- सम्राट।
प्रेमचंद जी उच्च थे, किया सृजन मेंं ठाठ॥

रंगभूमि उनने रचा, गबन और गोदान।
प्रेमचंद की लेखनी, गाँवों का सम्मान॥

कर्मभूमि अरु निर्मला, गहराई में डूब।
इनको जानो,लो समझ, लिखे गये क्या खूब॥

शोषण को अभिव्यक्त कर, बहुत निभाया साथ।
प्रेमचंद ने दीन को, सौंपा था निज हाथ॥

कथा गढ़ी हर भाव ले, प्रतिबिम्बित था काल।
मुंशी जी की लेखनी, करती रही कमाल॥

संवेदित लेखक रहे, चिंतन में जनवाद।
प्रेमचंद थे युगपुरुष, किया हरण अवसाद॥

आज जयंती पर नमन, बारंबार प्रणाम।
धनपत जी की जय करूँ, चोखा जिनका काम॥

परिचय–प्रो.(डॉ.)शरद नारायण खरे का वर्तमान बसेरा मंडला(मप्र) में है,जबकि स्थायी निवास ज़िला-अशोक नगर में हैL आपका जन्म १९६१ में २५ सितम्बर को ग्राम प्राणपुर(चन्देरी,ज़िला-अशोक नगर, मप्र)में हुआ हैL एम.ए.(इतिहास,प्रावीण्यताधारी), एल-एल.बी सहित पी-एच.डी.(इतिहास)तक शिक्षित डॉ. खरे शासकीय सेवा (प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष)में हैंL करीब चार दशकों में देश के पांच सौ से अधिक प्रकाशनों व विशेषांकों में दस हज़ार से अधिक रचनाएं प्रकाशित हुई हैंL गद्य-पद्य में कुल १७ कृतियां आपके खाते में हैंL साहित्यिक गतिविधि देखें तो आपकी रचनाओं का रेडियो(३८ बार), भोपाल दूरदर्शन (६ बार)सहित कई टी.वी. चैनल से प्रसारण हुआ है। ९ कृतियों व ८ पत्रिकाओं(विशेषांकों)का सम्पादन कर चुके डॉ. खरे सुपरिचित मंचीय हास्य-व्यंग्य  कवि तथा संयोजक,संचालक के साथ ही शोध निदेशक,विषय विशेषज्ञ और कई महाविद्यालयों में अध्ययन मंडल के सदस्य रहे हैं। आप एम.ए. की पुस्तकों के लेखक के साथ ही १२५ से अधिक कृतियों में प्राक्कथन -भूमिका का लेखन तथा २५० से अधिक कृतियों की समीक्षा का लेखन कर चुके हैंL  राष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों में १५० से अधिक शोध पत्रों की प्रस्तुति एवं सम्मेलनों-समारोहों में ३०० से ज्यादा व्याख्यान आदि भी आपके नाम है। सम्मान-अलंकरण-प्रशस्ति पत्र के निमित्त लगभग सभी राज्यों में ६०० से अधिक सारस्वत सम्मान-अवार्ड-अभिनंदन आपकी उपलब्धि है,जिसमें प्रमुख म.प्र. साहित्य अकादमी का अखिल भारतीय माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार(निबंध-५१० ००)है।