दीप्ति खरे
मंडला (मध्यप्रदेश)
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मौन संघर्ष, हाथों में छाले, सम्मान कब ? (मजदूर दिवस विशेष)…
सूरज से पहिले जो जग जाए,
जो देर रात को सोता है
शायद उसकी आँखों में भी,
खुशहाली का सपना पलता है।
फटे हुए कपड़ों से भी,
नहीं शिकायत कोई उसे
पेट की आग की खातिर वह,
दिनभर धूप में तपता है।
पैरों में पड़ते छालों की,
कतई उसे परवाह नहीं
थककर रुकना वह जाने न,
जाने किस मिट्टी से बनता है।
कभी सड़क तो कभी इमारत,
कभी खेतों में बहाता पसीना है
उसकी मेहनत से ही सजता,
सबके सपनों का नगीना है।
न मंचों पर नाम लिखा,
न उसे कोई सम्मान मिला
उसके मेहनतकश हाथों से ही,
आकार मंच को मिलता है।
संघर्ष उसकी किस्मत ही सही,
पर दया का वह पात्र नहीं।
मेहनत ही उसकी पहचान,
धरती पर वह सच्चा निर्माता है॥