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शोध, अनुवाद और अंतरभाषिक संवाद को बढ़ावा देना आवश्यक

चेन्नई।

शास्त्रीय साहित्य को केवल अतीत की धरोहर मानकर संग्रहालय में रखने के बजाय उसे वर्तमान जीवन और समकालीन चिंतन से जोड़ना होगा। इसके लिए शोध, अनुवाद और अंतरभाषिक संवाद को बढ़ावा देना आवश्यक है।
   केंद्रीय हिंदी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, उच्चतर शिक्षा विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली, मद्रास विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग एवं पूर्व छात्र संघ के संयुक्त तत्वावधान में ‘दक्षिण भारत का शास्त्रीय साहित्य’ विषय पर हुई राष्ट्रीय संगोष्ठी में यह बात मुख्य अतिथि के रूप में केंद्रीय विवि, हैदराबाद के पूर्व संकुलपति तथा शिक्षा मंत्रालय की भारतीय भाषा समिति के विशेषज्ञ प्रो. आर.एस. सर्जू ने कही।
उद्घाटन सत्र में मद्रास विवि की कुलसचिव डॉ. गीत जैन ने विज्ञान और साहित्य के बीच के गहरे अंतर्संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि विज्ञान और साहित्य को अलग-अलग खाँचों में नहीं देखा जा सकता। दोनों ही मानव जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड को समझने की जिज्ञासा से उपजते हैं।
   केंद्रीय हिंदी निदेशालय के उप निदेशक डॉ. नूर अहमद ने कहा कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, ज्ञान और हमारी सामूहिक स्मृतियों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जोड़ने वाली सशक्त कड़ी है। लखनऊ विवि के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. पवन अग्रवाल ने कहा कि दक्षिण भारत का शास्त्रीय साहित्य भारतीय साहित्य की व्यापक और बहुरंगी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मद्रास विश्वविद्यालय के तेलुगु विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. संपत कुमार ने कहा कि दक्षिण भारतीय भाषाओं के प्राचीन साहित्य में प्रकृति, प्रेम, वीरता, लोकजीवन, नैतिकता, सामाजिक सरोकार और मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत प्रभावशाली चित्रण मिलता है।
   एमओपी वैष्णव कॉलेज के भाषा विभागाध्यक्ष डॉ. आर. राजेश्वरी, मद्रास विवि में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. चिट्टी अन्नपूर्णा,
नें भी अपनी बात रखी। प्रो. बी. एल. आंबल और डॉ. पवन अग्रवाल की अध्यक्षता में प्रथम और द्वितीय विचार सत्र तमिल शास्त्रीय साहित्य पर केंद्रित रहे। इनमें डॉ. राजकुमार उपाध्याय, डॉ. इंद्रजीत, डॉ. आर. गजेश्वरी आदि ने अपनी बात रखी तो सत्र की अध्यक्षता डॉ. संत कुमार ने की।
    समापन सत्र की मुख्य अतिथि मद्रास उच्च न्यायालय की अधिवक्ता श्रीमती सुषमा ने राष्ट्रीय संगोष्ठी की सराहना करते हुए आयोजकों को साधुवाद दिया।
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,         
      मद्रास की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नीरा गुरुमूर्त ने कार्यक्रम का संचालन किया। सुनीता जाजोदिया ने धन्यवाद ज्ञापित किया।