प्रीति तिवारी कश्मीरा ‘वंदना शिवदासी’
सहारनपुर (उप्र)
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सतगुरु की खड़ी है नैय्या तू नाम धन दे के चढ़ जा,
नाम धुन में मगन रह निसदिन प्रभु की ओर बढ़ जा।
स्मरण में गुरु चरण सिर माथे चरण की रज,
है विकट मायाशक्ति प्रभु की प्रभुनाम पे बस तू अड़ जा।
पाप की गठरिया सिर राखी जनमों-जनम से,
फेंक तुरत-फुरत सांचे मन से ग्लानि की अग्नि में कढ़ जा।
कृपा करके प्रभु जी का नाम सतगुरु ने दिया,
मन अंगूठी में प्रभुनाम अपनी भक्ति से श्रद्धा से मढ़ जा।
सत्संग और सुमिरन की रस्सी सतगुरु बांधें,
श्रद्धा-भक्ति का खूंटा बन के निकट प्रभु जी के गड़ जा।
अज्ञान के कारण जग में सब अपना लागे,
बस प्रभु जी से नाता है सांचा सबक सतगुरु का पढ़ जा।
कागा बनता है हंस सतगुरु महिती कृपा से,
आनंदित प्रभुनाम दुग्ध पी के बलवती माया से लड़ जा।
सीप में मोती बनता स्वाति नक्षत्र बूँद,
आंख मूंद बैन सतगुरू मन धर तू विवेक, बैराग दृढ़ जा।
सतगुरु की खड़ी है नैय्या तू नाम धन दे के चढ़ जा।
नाम धुन में मगन रहे निसदिन प्रभु की ओर बढ़ जा॥