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हिंदी:वर्तमान स्थिति पर चिंतन जरूरी

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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हिन्दी दिवस (१४ सितम्बर) विशेष…

   भारत के लिए उसके जन-सम्पर्क की भाषा यानी हिन्दी आज़ादी के ७९ वर्ष बाद भी उपेक्षा का शिकार है, क्योंकि इसे वह अधिकृत स्थान नहीं मिला है, जो कभी से दे दिया जाना था। हिंदी, जो संविधान की राजभाषा है और देश की सबसे बड़ी भाषा है, पर वो अपने ही देश में एक अजीब-सी द्वंदपूर्ण स्थिति में जी रही है। एक ओर उसके बोलने वालों की संख्या बढ़ रही है, दूसरी तरफ सरकारी, शैक्षणिक, बैंक और सामाजिक स्तर पर उसके प्रति उदासीनता और भेदभाव की कहानियाँ कम नहीं हो रही हैं।
  यह हमारी भाषाई शक्ति होने पर भी विडंबना देखिए कि हम बेबस हैं। हिंदी, दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है, जिसके वक्ताओं की संख्या ६०.९ करोड़ से अधिक बताई जाती है।  भारत की लगभग ४४ से ५३ फीसदी आबादी हिंदी को अपनी पहली, दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में इस्तेमाल करती है। फिर भी केंद्रीय गृह मंत्रालय की रिपोर्टें बताती हैं कि सरकारी दस्तावेजों में हिंदी का उपयोग मात्र बहुत कम यानी ३० प्रतिशत के आसपास ही है। यह आँकड़ा स्पष्ट बताता है कि संवैधानिक दर्जा होने के बावजूद हिंदी को प्रशासनिक कामकाज में वह स्थान नहीं मिला, जिसकी अपेक्षा थी।

   अब बात करें शिक्षा के क्षेत्र की, तो यहाँ हिंदी की स्थिति और भी चिंताजनक है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदी लेखन में ८० प्रतिशत छात्र कमजोर पाए गए हैं, जबकि देश में अनेक संस्थानों में एम.ए. हिंदी में प्रवेश स्थान भरना भी मुश्किल हो रहा है। ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति-२०२०’ में मातृभाषा में शिक्षा का प्रावधान है, लेकिन व्यवहार में अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों की माँग और प्रतिष्ठा बढ़ती जा रही है। नतीजतन, हिंदी माध्यम के छात्रों को रोज़गार और उच्च शिक्षा में पिछड़ने का डर सताता है, जबकि हिंदी भाषा स्वयं एक संपर्क भाषा बनने की क्षमता रखती है।
   इस कृत्रिम बुद्धिमता (ए.आई.) और डिजिटल युग में यकीनन डिजिटल मंचों पर हिंदी की उपस्थिति बढ़ी है, लेकिन गुणवत्ता और प्रतिष्ठा का सवाल अब भी बना हुआ है। सोशल मीडिया पर हिंदी सामग्री का हिस्सा मात्र १०-१५ प्रतिशत बताया जाता है, जबकि गूगल और मेटा जैसे मंच  अंग्रेजी-प्रधान एल्गोरिद्म के कारण हिंदी को हाशिए पर धकेलते हैं। हिंदी शब्द-सिंधु जैसे डिजिटल शब्दकोश और ‘भारती’ जैसी ए.आई. पहले आशा की किरण हैं, लेकिन भाषाई आँकड़ों की कमी और तकनीकी समर्थन की कमी हिंदी को वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था में पिछड़ा बनाए हुए है।
   इस पिछड़ेपन की वजह देखें तो पता चलेगा कि सरकारी स्तर पर हिंदी के लिए कई योजनाएँ और विभाग हैं—राजभाषा विभाग, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, वार्षिक कार्यक्रम—लेकिन ज़मीनी स्तर पर प्रभाव सीमित है। राजभाषा विभाग के लक्ष्य कागज़ पर प्रभावशाली लगते हैं:१०० प्रतिशत हिंदी में पत्रों का उत्तर, ८० फीसदी फाइलों पर हिंदी टिप्पणी, ७५ फीसदी प्रशिक्षण हिंदी में, लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजी ही प्रतिष्ठा और प्रभाव की भाषा बनी हुई है। ‘हिंदी दिवस’ और ‘विश्व हिंदी दिवस’ पर भाषण होते हैं, लेकिन नीतिगत प्राथमिकता और बजट का आवंटन हिंदी के वास्तविक विकास के लिए अपर्याप्त है।
     हिंदी के प्रति भेदभाव केवल दक्षिण भारत तक सीमित नहीं है, दिल्ली और अन्य हिंदी-प्रधान राज्यों में भी सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षा और मीडिया में अंग्रेजी को वरीयता बनाम प्राथमिकता दी जाती है। हिंदी बोलने वालों को ‘कम प्रतिष्ठित’ या ‘ग्रामीण’ मानने की मानसिकता सामाजिक स्तर पर भी मौजूद है। यह भेदभाव आज़ादी के इतने वर्ष बाद भी बना हुआ है, जो भाषाई समानता के संवैधानिक आदर्शों के विपरीत है।
इन सब हालातों पर गौर करते हुए हिंदी की स्थिति पर आवश्यक और गंभीरता से चिंतन ज़रूरी है, लेकिन केवल चिंतन काफी नहीं। ज़रूरत है ठोस कार्रवाई की:शिक्षा में हिंदी माध्यम को मज़बूत करना, सरकारी कामकाज में हिंदी के उपयोग को अनिवार्य बनाना, डिजिटल मंचों पर हिंदी सामग्री को प्रोत्साहन देना, और सामाजिक स्तर पर भाषाई गर्व की भावना जगाना।  हिंदी को केवल एक ‘राजभाषा’ नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, तकनीक और संस्कृति की संपर्क भाषा बनाना होगा।
  आज की स्थिति में हिंदी का भविष्य केवल सरकारी नीतियों पर नहीं, बल्कि सभी के रवैये पर निर्भर करता है। यदि सरकार इसे अधिकृत दर्जा देगी और हम भी हिंदी को सम्मान देंगे, तो वह न केवल जीवित रहेगी, बल्कि एक शक्तिशाली वैश्विक भाषा के रूप में उभरेगी।