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अंजाम क्यों हो ‘श्रद्धा’ सा तुम्हारा!

दुर्गेश कुमार मेघवाल ‘डी.कुमार ‘अजस्र’
बूंदी (राजस्थान)
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श्रद्धा हत्याकांड…

सोया था मैं गहरी नींद में,
एक मुझे सपना आया
हाथ पकड़कर, गहन झंझोड़कर,
जैसे था मुझे नींद जगाया।

एक दिखा अस्पष्ट-सा साया,
जो धुंधला-सा लगता था
जिसने खुद को था ‘श्रद्धा’ बताया,
सुनकर मन डर से काँपता था।

बोली श्रद्धा, हो ‘अजस्र’ तुम,
क्या मेरे लिए, कर सकते कुछ ?
हश्र हुआ जो मेरा वैसा,
किसी का न हो, मैं चाहूँ सचमुच।

दोष क्या मेरा प्रेम किया था,
और देखें संग सुख-सपने
साथी मिलेगा, दांपत्य सजेगा,
और लगेगा संसार संवरने।

ऐसे ही सुख-सपनों खातिर,
स्वपरिवार तक छोड़ दिया
माता-पिता को, क्या मैं दोष दूं,
मैंने स्वयं उनको बस दुखी किया।

पढ़ी-लिखी मैं समझदार थी,
संस्कारों आधुनिक पली हुई
पर इसमें भी क्या दोष था मेरा,
जो देखा जग मैं, मैं चलते गई।

पहली-पहली बातों में मुझको,
उसने झूठ से बहकाया
सब्जबाग मुझे घने दिखाए,
तब जाकर धोखा खाया।

उसकी बातों का सच लेने,
निरख-परखने साथ चली
इसमें भी बाजीगरी उसकी,
कदम-कदम पर गई छली।

रिश्ता था ‘लिव-इन’ का हमारा,
सोच समझकर सब था किया
पर उसके धोखों के आगे,
कहीं भी मैंने ना सुकून लिया।

अहसास हुआ जब सच्चाई का,
बचने का बस प्रक्रम किया
किंतु देर बहुत हो ही चुकी थी,
उसने न कोई, मुझे मौका दिया।

मैं सम्भलूँ या उसे सुधारुँ,
उपाय मेरे कोई पास न था
विपरीत कुछ ऐसा मुझसे हुआ था,
अपना कोई साथ ना था।

जीवन से मैं हुई हताश तो,
मरने तक को सोच लिया
फिर भी अपने आत्मविश्वास से,
स्थिति संभालने प्रयास किया।

प्रेम, बहस और समझाइश,
क्या-क्या ना तब मैंने किया
चोट भी खाई, मार भी सह ली,
फिर भी उसने, दगा ही दिया।

बात तो तब फिर हद से बढ़ गई,
जीवन उसने छीन लिया
आत्मा रूप मैं फिर भी वहीं थी,
काट मुझे टुकड़ों में किया।

कानून को छलने, सजा से बचने,
बहुत उसने प्रबंध किया
पर मेरे ईश्वर ने उसको,
इसका कोई मौका ना दिया।

न्याय मिलेगा मुझे यकीन है,
देश-धर्म कानून पर
पर कैसे मानूं, कोई होगी ना आहत,
मुझ-सी दुर्गत, किसी मजलूम सर।

कहते-कहते आँखों-आँसू से,
गला उसका था भर आया
मैं भी उसकी करुण कथा सुन,
मन ही मन में था कलपाया।

एक पल बस, मन ही मन सोचा,
फिर बोला मैं विचार कर
कर्म तुम्हारा और जो उसका,
कुछ बचे नहीं उधार पर।

उसको सजा कानून मिलेगी,
उसका होगा बुरा भविष्य
पर तूने जो दुर्गत है पाई,
वैसा ना बिगड़े कोई और भविष्य।

भारत बाला ना, ‘श्रद्धा’ बने कोई,
प्रबंध ठोस करना होगा
दुर्गा-काली का स्वरूप लेकर के,
हर बाला को लड़ना होगा।

स्व की रक्षा स्वयं से होगी,
कमजोर नहीं हो कहीं भी तुम
कितने ही फिर ‘आफताब’ से आए,
धोखे में ना अब पढ़ोगे तुम।

संस्कार आधुनिक भले ही ले लो,
हो परिवार का साथ हमेशा
विपरीत कोई भी स्थिति भले हो,
साथ-सहारा तुम्हें मिलेगा।

स्वतंत्रता को स्वतंत्रता ही,
उच्छृंखलता मत इसे बनाओ
भारतीय संस्कृति के ‘अजस्र’ तत्वों को,
जो हितकर उनको अपनाओ।

सोच सही हो, प्रेम पवित्रता,
फिर डर तुम्हें ,जग काहे का
पर परिवार और साथ समाज की,
गति भी तुम्हें चलना होगा।

सच्चे लोग ही नारी को फिर,
दानव-नर से बचा लेंगे
देश-कानून मजबूत ‘अजस्र’ हो,
ना ‘श्रद्धा’ कोई फिर, बनने देंगे।

श्रद्धा मुस्काई, ज्यों ही उसने,
हाथ को मेरे, हाथ मिलाया।
धुंधलके खो गया, अस्पष्ट वो साया,
मैं भी नींद से फिर, सचेत आया॥

परिचय-हिन्दी-साहित्य के क्षेत्र में डी. कुमार ‘अजस्र’ के नाम से पहचाने जाने वाले दुर्गेश कुमार मेघवाल की जन्म तारीख १७ मई १९७७ तथा स्थान बूंदी (राजस्थान) है। आप सम्प्रति से राज. उच्च माध्य. विद्यालय (गुढ़ा नाथावतान, बून्दी) में हिंदी प्राध्यापक (व्याख्याता) के पद पर सेवाएं दे रहे हैं। छोटी काशी के रूप में विश्वविख्यात बूंदी शहर में आवासित श्री मेघवाल स्नातक और स्नातकोत्तर तक शिक्षा लेने के बाद इसी को कार्यक्षेत्र बनाते हुए सामाजिक एवं साहित्यिक क्षेत्र विविध रुप में जागरूकता फैला रहे हैं। इनकी लेखन विधा-काव्य और आलेख है, और इसके ज़रिए ही सामाजिक संचार माध्यम पर सक्रिय हैं। आपकी लेखनी को हिन्दी साहित्य साधना के निमित्त बाबू बालमुकुंद गुप्त हिंदी साहित्य सेवा सम्मान-२०१७, भाषा सारथी सम्मान-२०१८ सहित दिल्ली साहित्य रत्न सम्मान-२०१९, साहित्य रत्न अलंकरण-२०१९ और साधक सम्मान-२०२० आदि सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। हिंदीभाषा डॉटकॉम के साथ ही कई साहित्यिक मंचों द्वारा आयोजित स्पर्धाओं में भी प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कार पा चुके हैं। ‘देश की आभा’ एकल काव्य संग्रह के साथ ही २० से अधिक सांझा काव्य संग्रहों में आपकी रचनाएँ सम्मिलित हैं। प्रादेशिक-स्तर के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में भी रचनाएं स्थान पा चुकी हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य एवं नागरी लिपि की सेवा, मन की सन्तुष्टि, यश प्राप्ति और हो सके तो अर्थ की प्राप्ति भी है।

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