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अधिवेशन-संगोष्ठी से हिंदी को बढ़ावा देने की जरूरत

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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हर जगह हर समय स्थानीय-राज्य स्तरीय-राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिवेशन-संगोष्ठी-गोष्ठी होती रहती है और स्वाभाविक हैं उनमे भाग लेने वाले उस स्तर के विद्वान-लेखक-चिंतक भाग लेते हैं और उनकी योग्यता के आधार पर ही कार्यक्रम की गरिमा बनती हैl यह जरुरी है कि इनमें बहुत अच्छी जानकारियां उपलब्ध होती है और स्वाभाविक है कि इस अवसर पर विद्वतजनों को अपनी बात रखने का अवसर मिलता हैl
जहाँ तक राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय कार्यक्रमों में हमें यह देखने को मिलता है कि,जितनी अच्छी तरह से हम अपनी बात अपनी भाषा या हिंदी में रख सकते हैं,जिससे अधिकांश श्रोता उसको सही ढंग से समझ सकेl यहाँ प्रश्न उठता है कि वे अंग्रेजी भाषा में अपनी बात रखने में सुगमता महसूस करते हैं,जबकि वे हिंदी में भी पूछे गए प्रश्न का उत्तर अंग्रेजी में देते हैंl इसका आशय यह हुआ कि वे सब हिंदी से वाकिफ हैं,जानते हैं,समझते हैं और संभवतः अपने दैनिक जीवन में हिंदी का उपयोग अपने-अपनों में करते होंगे,क्योंकि आज फिल्म,टेलीविज़न में हिंदी की भरमार अधिक होती है और भारतवर्ष में रहने वाला किसी भी प्रान्त का हो,वह हिंदी अवश्य जानता हैl
अधिवेशन-गोष्ठियां एक ऐसा मंच है,जिसमें आमजन के अलावा यदि कोई विषय से अनभिज्ञ हो तो भी वह विषय वस्तु को जरूर समझ सकता है,और वक्ता भी कभी-कभी अपने सम्भाषण में हिंदी-संस्कृत के मुहावरों का भरपूर उपयोग करते हैं,जिस पर श्रोताओं की तालियां बहुत बजती हैं और बात शीघ्र ही समझ में आती हैl
जहाँ तक अंतरराष्ट्रीय स्तर के अधिवेशन कि बात है तो,इसमें अंग्रेजी का जरूर सहारा लिया जाए,पर जब विदेशी अपनी बात अपने देश की भाषा में रखता हैं और वह अपने आलेख का अंग्रेजी में अनुवाद रखता है या देता है,तो यहाँ हमें इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि यदि वक्ता अपनी बात अंग्रेजी में रखता है तो उसे अपने आलेख का अनुवाद हिंदी में जहाँ हिंदीभाषी लोग अधिक हों,रखना चाहिएl
इन गोष्ठियों से हम विद्वानों को सुनने और उनकी तारीफ करने नहीं जाते,वहां हम उनसे ज्ञान प्राप्त करने जाते हैं और उनका भाषण-आलेख जनसामान्य को न समझ में आये,तो कार्यक्रम की उतनी अधिक सार्थकता नहीं होगी,जितनी होनी चाहिएl यहाँ यह मानना जरूर है कि ऐसे कार्यक्रम एक विशिष्ट श्रेणी के लिए होते हैं,पर जब सामान्यजन उस कार्यक्रम में जाता है,तो उसे भी बात समझने का मौका मिलना चाहिएl
ये ऐसे मंच होते हैं जिनमें आप अपनी बात जितनी सुविधा से रखना चाहें,रख सकते हैं,और उसके माध्यम से अधिकतम लोगों को भी लाभ मिल सकता हैl वक्ता अपनी बात रखता है और उस दौरान कितने प्रतिशत समझ पाते हैं,यह कहना मुश्किल है,पर शत- प्रतिशत लाभ नहीं ले पाते हैंl सरकारी स्तर के कार्यक्रमों में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यदि वह कार्यक्रम पूर्ण अंग्रेजी में होना आवश्यक है तो उनका अनुवाद भी साथ में होना चाहिए,जिससे हम शीघ्रता से समझ सकें और अपनी हिंदी को स्थापित कर सकेंगेl कोई भी कार्यक्रम होता है तो जन सामान्य के साथ सभी के लिए लाभकारी होता है,और इसके माध्यम से हम अपनी बातों का आदान-प्रदान सुगमता से कर सकते हैl अपनी भाषा का विकास वैज्ञानिक,अनुसन्धान में भी सहयोगी बन सकता हैl इसके कारण वक्ताओं को भी हिंदी के विकास में अच्छी भागीदारी मिल सकेगी और अधिकतम उनको प्रशंसा और लोकप्रियता मिल सकेगीl विद्वानों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए,अन्यथा हम हिंदी का विकास अंगेजी में करें,यह कितना हास्यास्पद होगाl सभी कार्यक्रम बहुजन हिताय होना चाहिए,न कि सिर्फ विशेषजनों के लिएl

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।