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अनिर्वचनीय शिव

प्रीति तिवारी कश्मीरा ‘वंदना शिवदासी’
सहारनपुर (उप्र)
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हे! महादेव महेश्वर, 
हे! सर्वेश्वर त्रिनेत्रधर गौरीवर
हे! वृषभेश्वर पिनाकधर गौरीवर।

श्राप दियो शिव कश्यप ऋषि ने, 
मारोगे तुम पुत्र स्वयं का
भक्तन हित स्वीकारा श्राप भी, 
हे! करुणेश्वर त्रिशूलधर गौरीवर।

कालकूट विष पीकर शिव ने, 
औषधि में बस भंग जो पी ली
जग पिए मस्ती दोष धरे शिव, 
हे! विश्वेश्वर डमरूधर गौरीवर।

पाप करन से डरे ना जो भी, 
दंड मिले तो करता शिव-शिव
पाहि-पाहि हो दंड के मिलते, 
हे! कालेश्वर चंद्रधर गौरीवर‌‌।

आशुतोष शिव औघड़ दानी, 
शीघ्र प्रसन्न भक्त पर होते
बिल्व-पत्र गंगाजल पूजित, 
हे! सिद्धेश्वर गंगाधर गौरीवर।

आदि अंत तुम हर जीवन का, 
सब के स्वामी अंतर्यामी
तव महिमा वाणी से परे है, 
हे! ज्ञानेश्वर त्रिपुंड़धर गौरीवर।

हे महादेव महेश्वर, 
हे सर्वेश्वर त्रिनेत्रधर गौरीवर
हे वृषभेश्वर पिनाकधर गौरीवर॥