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अब मर्यादा नेता के आत्म-दर्पण से झांकती तक नहीं

शशि दीपक कपूर
मुंबई (महाराष्ट्र)
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राजनीति:उन्नति-भाग-२…

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद की राजनीति के रंग-ढंग पहले चुनाव के ५ साल के भीतर ही नजर आने लगे थे। चंद शिक्षित वर्ग के हाथों की कठपुतली बन राजनीति अहम में सवार होकर चलती रही। कौन पहले आकर बसा, कौन बाद में, प्रत्येक प्रदेश में कितनी जातियां व जनजातियां हैं, कितने छोटे-बड़े धर्म हैं ? आदि की चक्की में बहुत-सी पंचवर्षीय योजनाएं और बीस-इक्कीस व अट्ठाइस सूत्री योजनाओं का परचम तत्कालीन अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों ने परीक्षा में खूब चखा। राजनीति में लग रही पक्ष-विपक्ष की सेंध से लेखकों ने अनगिनत साहित्य भी रचे। इस दौर में न जाने किन आदर्शों को अपना कर प्रधानमंत्री गुलज़ारीलाल नंदा बेघर हो पांच रुपए तक का किराया चुकाने में असमर्थ हुए, जबकि सत्तारूढ़ पार्टी के नेता संसद से लेकर हर क्षेत्र में स्थाई रोजगार प्राप्ति की तरह धन बटोरने जा रहे थे, नाम कमा रहे थे। विपक्षी दलों का मुख्य कार्य था-बड़े उद्योगों की तालाबंदी और सड़कों पर हड़तालें, रास्ता रोको। महाविद्यालय में चुनावी राजनीति के प्रवेश का आगमन कराकर अति संतुष्ट ही नजर आए‌। पांच-छ: साल से परीक्षा में एक ही कक्षा में अनुत्तीर्ण हुए विद्यार्थियों के लिए यह अवसर सुनहरा साबित हुआ। यह प्रयोग समय-असमय आज की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा भी रहा है। श्रीकृष्ण का संदेश है, ‘गुरु कृपा के बिना कुछ भी संभव नहीं’। अत:, विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा आश्रम में गुरु आशीर्वाद मिला और प्रयोग समसमायिक राजनीति प्रयोजन में सफल है।
आए-दिन राजनीति में बढ़ती छींटाकशी के संवाद जनता को नि:संदेह फिल्मी ही लगते हैं। दिन-प्रति-दिन राजनीति का गिरता स्तर राष्ट्र भविष्य को अनिश्चित ही कर रहा है। अति शिक्षित और जागरूक नागरिक राजनीति से पल्ला झाड़ विदेश में ही स्थाई निवास बनाने को उत्सुक है।‌ साधारण जनता केवल अपने व्यवसाय और नौकरी से संतुष्ट है। सर्वधर्मों के धर्मात्मा यदा-कदा भड़काऊ वक्तव्यों के प्रचार-प्रसार में सलंग्न हैं। यानि राजनीति में राष्ट्रीय चेतना विलुप्त हो चुकी है। राजनीति मात्र ५ साल या उससे अधिक समय तक की कुर्सी बन चुकी है। भारत के भावी बच्चों को शिक्षा देने के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले की राजनीति उपदेशक है और तत्पश्चात की मात्र श्रीलाल शुक्ल की ‘राग-दरबारी’ ही है।

प्रश्न ज्यों का त्यों मुख पसारे समय से पूछ रहा है-‘राजनीति की दुर्दशा कैसे सही हो उन्नति पाए’। समसमायिक राजनीति के सम्बन्ध में उत्तर के लिए अनुमान ही लगाया जा सकता है, जहां बिछी हो षडयंत्र की शतरंज, वहां जीत-हार सब एक समान, क्योंकि अब तो डाकू खड़गसिंह जितनी मर्यादा किसी नेता के आत्म-दर्पण से झांकती तक नहीं है।

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