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अमर रहे स्वाधीनता

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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आजादी… और आज हम (१५ अगस्त विशेष)….

अमर रहे स्वाधीनता, भारत अमर  तिरंग। 
संविधान भारत अमर, लोकतंत्र  सतरंग॥

नार्यशक्ति हो संबलित, युवाशक्ति  उत्थान। 
पर्यावरण हरितिम सुखद, भारतीय विज्ञान॥

हर्षित सुख वैभव कृषक, मानवता सम्मान।
समरस बहु कौमी वतन, भारत चारु महान॥

आजादी की गूँज से, नया सबेरा  देश। 
बलिदानों के प्रति नमन, शान्ति प्रीति परिवेश॥

मानवीय सम्वेदना, लोक लाज  आचार। 
वयोवृद्ध सेवा वतन, वसुधा हो  परिवार॥

भारत हो शिक्षायतन, गुरुता जग  संदेश। 
मानवता के मोल से, परिचित जग परिवेश॥

विज्ञानी तकनीक से, पूर्ण    डीजिटल ज्ञान। 
ए.आई., मेटा लसित, मंगल चंद्र उड़ान॥

नव उड़ान संचार में, शक्ति सुदर्शन चक्र। 
नया सबेरा श्रम विजय, लोक तिरंगा फ़क्र॥

नयी ख़ोज नित साधना, चतुर्वेद    विज्ञान। 
नीति न्याय समता सुलभ, सच्चरित्र ईमान॥

राष्ट्र धर्म भाषा विविध, संस्कृति  बहुला देश। 
एक संघ एकत्व ही, बहु प्रदेश      उपवेश॥

नमन राष्ट्र स्वाधीनता, नमन  तिरंगा शान। 
नमन लोकमत भारती, नमन सनातन मान॥

अनुशासित यौवन विनत, मेधावी  गुण ज्ञान। 
संस्कार षोडश चरित, भारत प्रगति विधान॥

रोजगार शिक्षा परक, युवाशक्ति अधिकार। 
सुख धन यश हो सबेरा, देना है  सरकार॥

लोकतंत्र होगा सफल, सम जन सर्व विकास। 
तभी युवा अनुरक्ति हो, भारत वर्ष सुवास॥

बलिदानों की दास्ताँ, गौरव हो युव देश। 
गुँजे वन्दे मातरम्, जन गण मन    उपवेश॥

केशरिया धवला सरित, कालचक्र नीलाभ। 
शान्ति कान्ति सम्प्रीति रस, ध्वज तिरंग अरुणाभ॥

आएँ मिल गाएँ सुयश, आजादी    बलिदान। 
युवाशक्ति उत्थान यश, दें तिरंग  सम्मान॥

सावधान आतंक से, देशविरोधी    राग। 
समय सुदर्शन चक्र फिर, युवा  करो सहभाग॥

नव विहान पुरुषार्थ से, लिखे  दास्तां देश। 
अमर कथा कुर्बानियाँ, आजादी    परिवेश॥

करें गान माँ भारती, जन गण तंत्र  विधान। 
नमन सैन्य रण वीरता, तिरंगा भारत आन॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥