पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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सबका संसार ‘माँ’ (‘मातृ दिवस’ विशेष)….
अम्मा तुम बहुत याद आती हो,
एक साल बीत गया…
लगता है जैसे कल ही,
तो तुमसे बात करी थी
कितनी शांत और चैन की
नींद सो रही थीं,
मानों कोई तपस्विनी
मस्तक पर चंदन का टीका लगा कर,
योगनिद्रा में ध्यान लगा रही हो
अम्मा तुम मुक्त हो गई,
सांसारिक बंधनों से, शारीरिक कष्टों से
मृत्यु तो जीवन का शाश्वत सत्य है,
सत्य को स्वीकारना ही होगा।
अम्मा तुम्हारी बहुत याद आती है,
तुम तो रोम-रोम में बसी हो
भाभियों का फोन जब तब आता था,
वह मनुहार करती रहतीं थीं
दीदी, बहुत दिन हो गए,
मम्मी आपको याद करती रहती हैं
एक बार कुछ दिनों के लिए ही
आप आ जाओ,
मम्मी के चेहरे पर आपको देख कर मुस्कान छा जाती है
किचन से पकवानों की महक उडने लगती है,
बच्चे भी बुआ के आने का इंतजार करते हैं
क्या बुआ नाराज हैं ? क्यों नहीं आतीं ?
आँखों के सामने कृषकाय लकवाग्रस्त,
अम्मा का चेहरा आँखों के समक्ष घूमने लगता है
बिस्तर पर एक किनारे लेटी हुई,
अशक्त अपने से उठ भी नहीं सकतीं दूसरा कोई उठाए तो मुश्किल से उठ पातीं हो,
अम्मा तुम्हारी यह दशा
मुझसे देखी नहीं जाती
तुम्हारे सामने आँखें भर भर आतीं,
अपने को संभालती थी
तुम मुझे देखते ही मुस्कुरा कर
पूछतीं थीं, कैसी हो बेटी ?
अपने मन की सब बातें मुझसे
साझा करना चाहतीं थीं,
कुछ कहतीं, कुछ समझती थी
बेटे-बहुओं के सदा गुण गाती रहती,
भाभियों के लिए तारीफ और आशीर्वाद
तुम्हारी जुबां पर सदा रहता,
लेकिन अम्मा तुम्हारी दशा देख कर मन बुझ बुझ जाता, दिल रो उठता है।
बहुत याद आता है वह सुंदर चेहरा, सिंदूर के टीके से सजा हुआ माथा
सुबह-सबेरे सुमधुर स्वरों में पद गाती हुई,
कभी अखबार पढ़ती, कभी सब्जी काटती
कभी खाना बनाती हुई झपकी लेती,
आज सोचती हूँ कि कैसे तुम कर लेती थीं!
कहाँ से पाया था इतना संतोष, इतनी सहनशक्ति
कजली तीज पर मेंहदी और चूड़ियों से सजे हाथ,
नई सूती साड़ी में ही तुम खुश हो जातीं थी
तुम्हारा सौंदर्य निखर उठता था,
क्योंकि अम्मा तुम दिल से खुश होतीं थीं
तुमने तो कभी अपनी पसंद से
एक साड़ी भी नहीं खरीदी होगी,
जो बाबू जी लाते, वही खुशी से पहन लिया करतीं थीं
तुम्हें तो बाबू जी से कभी बहस करते नहीं देखा,
हमेशा उनकी बात चुप रह कर सिर माथे कर लेतीं
मैं तुम्हारी तरह क्यों नहीं बन पायी,
बहुत चाहती हूँ, लेकिन मन क्रोधित हो उठता है
कभी निराशा तो कभी उदासी हावी हो जाती है।
तब तुम्हारी बहुत ही याद आती है, जब उस दिन भाभी से बोलीं थीं-
ये तो शुरू से चावल थोडा ही खाती हैं
मन बचपन की यादों में खो गया था,
तुम्हारे हाथ का एक निवाला कितना
अच्छा लगता था,
जब-तब मैं मुँह खोल कर बैठ जाती थी
अम्मा बस एक गस्सा,
यह लाड़, यह दुलार तो केवल
अम्मा ही कर सकती है
अम्मा तुम बहुत याद आती हो।
क्या-क्या याद करूँ अम्मा!
बात-बात पर कभी बहस कर बैठती हूँ
कभी गुस्सा हो जाती हूँ,
फिर पछताती हूँ… चुप भी तो रह सकती थी
तुम्हें भी तो अम्मा गुस्सा आता होगा!
भला-बुरा भी लगता ही रहा होगा
तुम्हारी सीख याद है मुझे।
अब मैं खाने से कभी नाराज नहीं होती,
अम्मा तुम बहुत याद आती हो…॥
तुम्हारी बेटी
पद्मा अग्रवाल