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अवध लौट रहे रघुराई

संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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अवध में लौट रहे रघुराई,
खड़े जन आरती की थाल सजाई
उत्सुकता सबके मन थी आई,
कैसे दिख रहे दोनों भाई,
कैसी दिखती हैं सीता माई
ये शंका सबके मन थी आई,
कितनों ने दूर से नजर गड़ाई
कई ने निकट से दृष्टि मिलाई,
मेरे लौट रहे रघुराई
संग लक्ष्मण व सीता माई,
सभी ने पूरी अवध सजाई
अवध ने खूब खुशी मनाई,
अवध में लौट रहे रघुराई…।

झोपड़ी दुल्हन जैसी सजाई,
संत जन कुटिया करें लीपाई
राह में ढोल, नगाड़ा शहनाई,
स्वागत में अवध ने पलक बिछाई
अवध ने घर-घर दीप जलाई,
महोत्सव बेला बड़ी अवध में आई
देख प्रफुल्लित हुए रघुराई,
खड़े हो स्नेह से किए बड़ाई
खुशी के आँसू की झड़ी न रुक पाई,
अवध में लौट रहे रघुराई…।

१४ बरस वनवास के काट कटाई,
समूचे अवध में लहर खुशी की आई
चहुंओर बने-बँटे खूब पूड़ी, खीर-मलाई,
मस्त था अवध देख रघुराई
मर्यादा पुरुषोत्तम ने मुख मंडल से ऐसी प्रीत छलकाई,
भीड़ में आतुर अवध के बच्चे-बूढ़े, भाई
अवध में लौट रहे रघुराई…।

राम के मन में कल्पना राम राज की आई,
अवध में अद्भुत दुनिया बसाई
देवलोक ने पुष्प की वर्षा कराई,
श्री राम ने मर्यादा हमें पढ़ाई
मानवता, पुरुषोत्तम सीख सिखाई,
अवध में लौट रहे रघुराई…।

आगे-आगे हनुमान बढ़ रहे,
पीछे सारे कपिस संग भाई
सीता माता हर्षित, मूर्छित, संभालते चले मेरे रघुराई
अवध में अजब खुशी लहराई,
माँ कौशल्या दूर निहारे
कैसे पहले दरश करूँ मैं,
भीड़ थी जोर बड़ी अकुलाई।
भीड़ में ओझल होते रघुराई,
अवध में लौट रहे रघुराई…॥

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएससी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता, रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुंबई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़ें हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में आपको
महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२० २३ सहित अन्य सम्मान हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले संजय सिंह ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज-
पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”