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आजादी के नए जन्म का सुखद संकेत

ललित गर्ग
दिल्ली
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भारतीय स्वतंत्रता का एक नया दौर प्रारंभ हो रहा है या यूँ कहूं कि हमारी आजादी अब अमृत महोत्सव मनाने के बाद शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर हो रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह लाल किले की प्राचीर से अपना गैर-राजनीतिक वक्तव्य देकर देश की जनता को जगाया, वहीं राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी। उन्होंने परिवारवाद और भ्रष्टाचार पर प्रहार करते हुए अनेक ऐसी समस्याओं का जिक्र किया, जो एक प्रधानमंत्री के मुख से कम ही सुनने को मिलती है। इससे यह तो साफ हो गया कि वे इन बुराइयों से निपटने और उनके खिलाफ जनमत का निर्माण करने के लिए संकल्प ले चुके हैं। उन्होंने राजनीति ही नहीं, बल्कि जन-जन में व्याप्त होते भाई-भतीजावाद जैसी अनेक विसंगतियों एवं विषमताओं को देश के लिए गंभीर खतरा बताया। सब जानते हैं कि देश में व्यापारिक घरानों से लेकर न्याय-प्रक्रिया, धार्मिक, सामाजिक संगठनों में यह व्यापक स्तर पर परिव्याप्त है। एक लंबे अर्से से न्यायपालिका में परिवारवाद को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
आमतौर पर स्वाधीनता दिवस को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री सरकार की उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं पर बात करते हैं, मगर इस बार नरेन्द्र मोदी ने इस परंपरा को तोड़ते हुए ऐसी बड़ी चुनौतियों को रेखांकित किया, जिसे लेकर विपक्ष की भृकुटि कुछ तन गई है। सबसे बड़ी बात, वह यह कहती है कि “अभी सभी कुछ समाप्त नहीं हुआ। अभी भी सब कुछ ठीक हो सकता है।” मोदी-उद्बोधन कोई स्वप्न नहीं, जो कभी पूरा नहीं होता। यह तो भारत को सशक्त एवं विकसित बनाने के लिए ताजी हवा की खिड़की है।
लगभग देश के कौने-कौने, हर मुहल्ले में कोई न कोई विशेष आयोजन और हर घर तिरंगा अभियान तो कुल मिलाकर बहुत यादगार रहा है। इस खास पड़ाव पर जितना महत्वपूर्ण राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का उद्बोधन है, उतनी ही चर्चा प्रधानमंत्री के भाषण की हुई है। राष्ट्रपति ने कहा कि हम भारतीयों ने संदेह जताने वाले लोगों को गलत साबित कर दिया है। इस मिट्टी में न केवल लोकतंत्र की जड़ें बढ़ी हैं, बल्कि समृद्ध भी हुईं। राष्ट्रपति ने कहा कि देश का विकास अधिक समावेशी होता जा रहा है और क्षेत्रीय असमानताएं भी कम हो रही हैं। राष्ट्रपति ने अपने पहले उद्बोधन से देशवासियों को गर्व का भी एहसास कराया है।
नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से भ्रष्टाचारियों पर जमकर प्रहार किया। उन्होंने इसके खिलाफ जंग में देशवासियों का सहयोग भी मांगा। प्रधानमंत्री के इस उपयोगी उद्बोधन के अनेक अर्थ निकाले जा रहे हैं, प्रशंसा हो रही है, तो आलोचक भी कम नहीं हैं। भ्रष्टाचार देश में अगर बढ़ रहा है, तो किसकी जिम्मेदारी बनती है ? भ्रष्टाचार को कौन खत्म करेगा ? इस सवाल का उठना अपने-आपमें गंभीर बात है। आजादी के स्वप्न में भ्रष्टाचार से मुक्ति भी शामिल थी। आज भ्रष्टाचार पर प्रधानमंत्री अगर चिंता जता रहे हैं, तो देश अच्छी तरह से वस्तुस्थिति को समझ रहा है। प्रधानमंत्री ने बिल्कुल सही कहा है कि किसी के पास रहने को जगह नहीं और किसी के पास चोरी का माल रखने की जगह नहीं है। भारतीय जनता को सदैव ही किसी न किसी स्रोत से ऐसे संदेश मिलते रहे हैं। कभी हिमालय की चोटियों से, कभी गंगा के तटों से और कभी सागर की लहरों से, तो कभी श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध और महावीर से। यहां तक कि हमारे पर्व होली, दीपावली भी संदेश देते रहते हैं, लेकिन इस बार आजादी का अमृत महोत्सव एवं उद्बोधन इस सन्देश का माध्यम बना। निश्चित ही इन संदेशों से भारतीय जन-मानस की राष्ट्रीयता सम्भलती रही, सजती रही और कसौटी पर आती रही तथा बचती रही। एक बार फिर प्रधानमंत्री ने राजनीति से परे जाकर देश को जोड़ने, सशक्त बनाने एवं नया भारत निर्मित करने का सन्देश दिया है और इस सन्देश को जिस तरह आकार दिया जाना है, उसके ५ प्रण भी व्यक्त किए गए हैं।
कोई भी विकसित होता देश किन्हीं समस्याओं पर थमता नहीं है। समाधान तलाशते हुए आगे बढ़ना ही जीवंत एवं विकसित देश की पहचान होती है। प्रधानमंत्री ने जिन प्रण की बात की है, उन संकल्पों को अगले २५ वर्षों में जब देश अपनी आजादी के १०० साल पूरे करेगा, तब तक पूरा करना है। पहला संकल्प-विकसित देश बनना, दूसरा-देश के किसी कोने में गुलामी का अंश न रह जाए, तीसरा- हमें अपनी विरासत पर गर्व होना चाहिए, चौथा- देश में एकता और एकजुटता रहे एवं पांचवां संकल्प-नागरिकों का कर्तव्य है।
प्रधानमंत्री ने उचित ही कहा है कि यदि सरकार का कर्तव्य है- हर समय बिजली देना, तो नागरिक का कर्तव्य है- कम से कम बिजली खर्च करना। अगर हमने इन संकल्पों को गंभीरता से लिया, तो भारत को विश्वगुरु होने से कोई नहीं रोक सकेगा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जीवन धारा को जो रास्ता लेना था, वह नहीं मिला। स्वतंत्रता का सदुपयोग नहीं कर सके। मनुष्य-मनुष्य में जब तक प्रेम और सहयोग का अटल नियम नहीं माना जाएगा, तब तक उभयपक्षी की स्वतंत्रता नहीं रह सकती। हमने यह अनदेखा किया।
अनुशासन का अर्थ हम निजी सुविधानुसार निकालते रहे। जिसका विषैला असर प्रजातंत्र के सर्वोच्च मंच से लेकर साधारण नागरिक की छोटी से छोटी इकाई गृहस्थी तक देखा जा सकता है। बच्चा-बच्चा अपनी जाति में वापिस चला गया। कस्बे-कस्बे में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की सीमाएं खिंच गईं। क्रांति का मतलब मारना नहीं, राष्ट्र की व्यवस्था को बदलना होता है। वास्तव में यदि हम भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के अपने सपने को साकार करना चाहते हैं तो हमें अपनी सोच और अपने तौर-तरीके बदलने होंगे। जब प्रधानमंत्री देश को बदलने और आगे ले जाने के लिए संकल्प व्यक्त कर रहे हैं तो फिर देश की जनता का भी यह दायित्व बनता है कि वह अपने हिस्से के संकल्प ले।