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आतंक

गंगाप्रसाद पांडे ‘भावुक’
भंगवा(उत्तरप्रदेश)
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प्रार्थना में उठे हाथ,
उड़ गये चीथड़े।
दीवारों पे बिखरा रक्त,
लोग इधर उधर पड़े मिले।
चारों ओर सिर्फ चीखें,
कौन मनाये ईस्टर।
पूरा चर्च था खून से सना,
कितना भयानक मंजर।
एक के बाद एक,
सिलसिलेवार विस्फोट।
एक विशेष ही समुदाय,
को पहुँचाई चोट।
रोते बच्चे,बिखरी महिलाएं,
अधमरे बुजुर्ग।
मृत जवानों की फड़कती
लाशों से बहती रक्त धार,
चिल्ला-चिल्ला के करे पुकार।
बंद करो ये सर्वनाशी
आतंकी भाषा,
बची रहने दो मानवता
शेष रहे जीने की आशा।
आतंक के पोषकों,
मानवता के शोषकों
की कर रहा विश्व,
शांति समुदाय भर्त्सना,
अब काफी नही सिर्फ
आलोचना।
आओ समस्त मिल
करे आतंक का प्रतिकार,
कठोर प्रहार,
खत्म करें बढ़ती
ये विष बेल,
समाप्त हो आतंकी
खेल।

परिचय-गंगाप्रसाद पांडेय का उपनाम-भावुक है। इनकी जन्म तारीख २९ अक्टूबर १९५९ एवं जन्म स्थान- समनाभार(जिला सुल्तानपुर-उ.प्र.)है। वर्तमान और स्थाई पता जिला प्रतापगढ़(उ.प्र.)है। शहर भंगवा(प्रतापगढ़) वासी श्री पांडेय की शिक्षा-बी.एस-सी.,बी.एड.और एम.ए. (इतिहास)है। आपका कार्यक्षेत्र-दवा व्यवसाय है। सामाजिक गतिविधि के निमित्त प्राकृतिक आपदा-विपदा में बढ़-चढ़कर जन सहयोग करते हैं। इनकी लेखन विधा-हाइकु और अतुकांत विधा की कविताएं हैं। प्रकाशन में-‘कस्तूरी की तलाश'(विश्व का प्रथम रेंगा संग्रह) आ चुकी है। अन्य प्रकाशन में ‘हाइकु-मंजूषा’ राष्ट्रीय संकलन में २० हाइकु चयनित एवं प्रकाशित हैं। आपकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक एवं राष्ट्रीय ज्वलंत समस्याओं को उजागर करना एवं उनके निराकरण की तलाश सहित रूढ़ियों का विरोध करना है।