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आशा और आँसू के द्वीप

 

डॉ.स्वाति तिवारी
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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किताबों में पढ़ा था,दुनिया के पर्यटन नक़्शे में जिसे कई बार देखा था उसे खुली आँखों से कभी देखूँगी नहीं सोचा था पर समय के पैर किसने देखे ? समय का खेल किसने देखा ? कब समय चक्र हमें यहाँ से वहाँ,वहाँ से यहाँ ले जाए यह कोई नहीं जानता ? पिताजी ने भूगोल पढ़ाते हुए दुनिया का नक्शा दिखाया था। फिर वे हमें नक़्शे में रंग भरने का खेल सिखाने के बहाने सामान्य ज्ञान की कई महत्वपूर्ण जानकारी खेल खेल में सिखा देते थे जो कि जीवन भर नहीं भूली जा सकती। आठवीं कक्षा में थी तब और पाँचवी कक्षा से ही भारत के नक़्शे में रंग भर रही थी। आठवीं कक्षा तक आते-आते उत्तरी अमेरिका,दक्षिण अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया के नक़्शे हमारे लिए होते थे। पिताजी नहीं रहे पर दुनिया के नक़्शे में जो जहाँ थे वहीं है बस हुआ ये कि जहाँ वे हमें नक़्शे भरवाकर ले जाते थे,एक समय ऐसा आया कि हम बहनों के बच्चे उन नक्शों में जा बैठे। मेरी बेटी पल्लवी अमेरिका में पढ़ रही थी ठीक उसी वक़्त मेरी बड़ी बहन का बेटा ऑस्ट्रेलिया चला गया था और मेरा बेटा अनमोल जर्मनी में अपना शोध प्रबंध(थीसिस) लिख रहा था। हम बहनों को आश्चर्य होता जो कभी हमारे लिए केवल नक़्शे थे,जो नक़्शे में निशान लगाकर खोजने के खेल थे,आज वहाँ हमारे बच्चे रह रहे थे। तो क्या पिताजी यह जानते थे या वे चाहते थे कि एक दिन उनके खिलवाये गेम में,हम निशान नहीं लगाएँ,बल्कि अपने बच्चों के पास वहाँ जाएँ। नक्शे भरवाने के बहाने वे हमें दुनिया के सौंदर्य से मिलवा रहे थे ? कितनी संजीदगी से वे जगहों के बारे में समझाते थे,मजाल है कि आपका ध्यान कहीं और चला जाए…मेरे जीवन में एकाग्रता का कोई पाठ यहीं से शुरू हुआ होगा जो पीढ़ियों में भी गया है।

हम पति-पत्नी संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा पर थे और,उसी का हिस्सा था नक्शे में निशान लगाकर खोजने वाली यह विशाल मूर्ति जिसका तब नाम भी बोलते हुए गड़बड़ा जाते थे-‘समानता,आज़ादी और न्याय’ की मशाल को हाथ में लिए खड़ी विशाल ‘स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी’,जो वर्षों तक महासागर में खड़ी रहकर स्वतंत्रता की इच्छा रखने वालों के लिए आधुनिक दुनिया में स्वागत का प्रतीक बनी। पहले हम मैनहैटन गए। मैनहैटन के बाद हमारी अगली यात्रा थी लिबर्टी आइलैंड की। यहाँ के लिए हमने बैटरी पार्क के बजाए लिबर्टी स्टेट पार्क की ओर से जाना तय किया। पहला पड़ाव न्यू पोर्ट वॉटरफ्रंट रहा।

न्यू जर्सी की यात्रा में पहली ही छुट्टी वाले दिन पल्लवी ने कहा-आज हम लिबर्टी चलते हैं,माँ ये लो आपकी पसंद की स्कर्ट, आज आप इसे पहन लो। आपका बहुत दिनों से मन स्कर्ट पहनने का था न ? मैं झेंप गई, इसको कैसे पता ? ये लो ये स्कर्ट और ये शर्ट’ पल्लवी के हाथ में वही स्कर्ट थी जो मैं उस दिन मैसीज़ में देख रही थी,उसने गले में हाथ डाले और स्कर्ट गले में डाल दी,चलो फटाफट|

सालों-साल हो गए स्कर्ट पहने को,वो जमाना और था जब वजन ४०-४५ के आसपास था अब स्कर्ट…? मैंने सलवार सूट निकाला सूटकेस में से,तो पल्लवी ने कहा-हम ‘स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी’ जा रहे हैं,आप जो पहनना चाहो पहन लो। यहाँ आपकी कोई ससुराल नहीं है,स्वतंत्र देश है। स्वतंत्रता का सम्मान करते हुए यहाँ कुछ भी पहना जा सकता है। आपका मन था,आप पसंद कर रहे थे ना उस दिन,मैंने ले लिया आपके लिए। सालों बाद घर के बाहर स्कर्ट पहनकर गई। आप अपने नियमित काम से जिस तरह बदलाव चाहते हैं वस्त्रों में भी वही बात है। यह बदलाव एक अलग अनुभव था,बहरहाल हमें स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी जाना था। स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी अमेरिका में न्यूयॉर्क हार्बर के न्यूयॉर्क शहर में लिबर्टी आइलैंड पर स्थित है। न्यूयॉर्क शहर से लिबर्टी आइलैंड की दूरी १.२ मील है। आसपास के किसी भी शहर से स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी आप कार से जा सकते हैं,हम भी कार से ही गए। फिर जहाज जैसी नाव(जिसे फेरी कहते हैं)में बैठकर गंतव्य स्थान पर गए।हालाँकि,यदि सीधे जाना हो तो यहाँ सबसे पास न्यूयॉर्क लिबर्टी इंटरनेशनल एयरपोर्ट है। यहाँ से टैक्सी (कैब) इत्यादि तैयार मिलती है,जो ली जा सकती है।

मैंने देखी एक ऐसी नदी,जिसके नीचे से कोई सुरंग जाती है जिसमें कार,ट्रक सब वहाँ चलते हैं। ये नदी इतनी बड़ी कि,समन्दर का भ्रम देती है। पूछना पड़ा-ये नदी है या समुद्र ?पल्लवी ने अपने नानाजी की तरह ही बताना शुरू किया-“माँ ये हडसन नदी है,जो अटलांटिक महासागर में मिलने से ठीक पहले विशाल आकार ले लेती है और खुद ही समुद्र बन जाती है। इसके तट पर एक ओर मैनहैटन है और दूसरी ओर जर्सी सिटी। जर्सी सिटी के न्यू पोर्ट में बेयोन ब्रिज और जॉर्ज वॉशिंगटन ब्रिज के बीच नदी के किनारे पानी में खंभे खड़े कर लकड़ी के मोटे फट्टों से और कहीं-कहीं टाइल्स से एक चौड़ा पथ बनाया गया है जिसके बीच-बीच में अमेरिकन स्टाइल के बगीचे जैसी हरियाली(ग्रीनरी) के लिए पेड़-पौधों से सजावट की गयी है। अंदाजन एक मील चौड़े नदी के पाट पर गुजरते जहाजों के पार से मैनहैटन का नज़ारा बहुत नयनाभिराम होता है। पूरे अमेरिका में शांत सुखद नितांत आत्मकेन्द्रित शामें गुजारने के लिए इससे बेहतर और खूबसूरत दूसरी कोई जगह नहीं होगी,जहाँ भीड़ भरे न्यूयॉर्क की अपेक्षा सुकून है। हडसन का पानी जाने कौन-सी दार्शनिकता के भाव जगाता-सा महसूस हुआ। हो सकता है पानी,नदी और किनारों में कोई जादू सा-होता है जो मुझे आत्मकेन्द्रित करने लगता है। दार्शनिक अंदाज में उन खास व्यक्तियों के बारे में सोचने लगती हूँ जिन्होंने दुनिया को स्वतंत्रता दिलवाने के लिए क्या-क्या कर डाला ?

पश्चिम में दासप्रथा उन्मूलन संबंधी वातावरण १८वीं शती में बनने लगा था। अमरीकी स्वातंत्र्य युद्ध का एक प्रमुख नारा मनुष्य की स्वतंत्रता था और फलस्वरूप संयुक्त राज्य के उत्तरी राज्यों में सन् १८०४ तक दासता विरोधी वातावरण बनाने में मानवीय मूल अधिकारों पर घोर निष्ठा रखने वाली फ्रांसीसी राज्य क्रांति का अधिक महत्व है। उस महान क्रांति से प्रेरणा पाकर सन् १८२१ में सांतो दोमिंगो में स्पेन के विरुद्ध विद्रोह हुआ और हब्शी गणराज्य की स्थापना हुई। अमरीकी महाद्वीपों के सभी देशों में दासता विरोधी आंदोलन प्रबल होने लगा और एक दिन एक मूर्ति फ्रान्स ने १८८६ में अमेरिका को दी थी। दासता का दर्द वही जानता है जिसने दासता की पीड़ा को झेला हो। दासता से मुक्ति का कोई इतना सुन्दर प्रतीक बना सकता है, यह मेरे लिए आश्चर्य का विषय था।

तस्वीरों में जिसे कई बार देखा था,उसे पास से देखना एक अलग ही अहसास होता है। मैं देख रही थी उस विशाल भव्य कलाकृति को जिसे ‘स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी’ के नाम से सारी दुनिया जानती है। यह न्यूयॉर्क हार्बर में स्थित एक विशाल मूर्ति है। तस्वीर में दिखने वाली मूर्ति की अपेक्षा यह बहुत ही विशाल है। २२ मंज़िला इस मूर्ति के ताज तक पहुँचने के लिये ३५४ घुमावदार सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।प्रतिमा के एक ऊपर उठाए हुए दाहिने हाथ की लम्बाई ४२ फीट है। इस हाथ द्वारा पकड़ी गई मशाल की लम्बाई २९.२ फीट है। स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी के बाएँ हाथ में एक पुस्तक है जिसकी लम्बाई २३ फीट है। ताँबे की यह मूर्ति १५१ फुट लंबी है,लेकिन चौकी और आधारशिला मिलाकर यह ३०५ फुट ऊँची है। अमेरिकन क्रांति के दौरान फ्रान्स और अमेरिका की दोस्ती के प्रतीक के तौर पर ताँबे की बनी है ये मूर्ति। बहुत ज्यादा नहीं जानती थी मैं इसके बारे में,जानकारी के लिए एक छोटी-सी बुकलेट ली तो पता चला कि ‘स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी’ स्वतंत्रता का प्रतीक है। इसका वजन साढ़े चार लाख पौंड है। यह पूरी प्रतिमा ताम्बे की मोटी चद्दर से बनी हुई है। इस ताम्बे की चद्दर की मोटाई साढ़े तीन इंच है। फ्रांस के लोगों ने इसको १९८६ में अमेरिका को उपहार में दिया था। अतः यह अमेरिका व फ्रांस की दोस्ती का भी प्रतीक है।

कहते हैं कि,जब अमेरिका अपनी स्वतंत्रता की शताब्दी का जश्न मना रहा था, उस जश्न में उसके मित्र देश के प्रतिनिधियों ने स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी उपहार में देने की पेशकश की। यह सांकेतिक रूप से आजादी के प्रतीक की प्रतिमा थी,लेकिन ऐसा कहा जाता है कि अमेरिका ने इसे लेने के लिए पूरी तरह से हाँ नहीं कहा एवँ वह हिचकिचाता रहा। उस समय इसमें करीब एक लाख डॉलर खर्च आने की संभावना थी। फ़्रांस इसको बनाकर अमेरिका को देने वाला था। यह फ़्रांस के मूर्तिकार फ्रेडरिक ऑगस्ट बर्थोल्डी द्वारा बनाई गई थी।अंततः इसको बनाने का कार्य शुरू तो कर दिया लेकिन बीच में ही इसे बनाना बंद करना पड़ा। एक लम्बे अंतराल तक इसका निर्माण रुका रहा,संभव है कि आर्थिक परेशानी की वजह से निर्माण रुका हो। निर्माण कार्य वापस शुरू किया गया एवं निर्माण को पूरा किया गया। उस समय इसके निर्माण में करीब ढाई लाख डॉलर का खर्च आया था। बनाने के बाद १९८५ में इसे फ्रांस से अमेरिका लाया गया। स्टेचू को इसके हिस्सों में २१४ बक्सों में बंद कर ‘इसरो’ जहाज में लाया गया था। अमेरिका में इसे बेडलॉज नाम के एक टापू पर स्थापित किया गया। इस बेडलॉज टापू का नाम ४ जुलाई १८८६ में बदलकर लिबर्टी आइलैंड रख दिया गया। हम उसी टापू पर खड़े थे,जिसे एक खूबसूरत बगीचे में बदल दिया गया है। टापू कुछ इस तरह बना है जिसके ठीक मध्य में यह विशाल मूर्ति रखी गई प्रतीत होती है। इसकी विशालता के आगे आम इंसान बौना नज़र आता है|

फ्रांस ने उपहार भी क्या चुना,स्वतन्त्रता की सही हकदार एक स्त्री का स्टेचू ? जी हाँ, स्टेचू ऑफ़ लिबर्टी एक पोशाकधारी औरत की प्रतिमा है। यह औरत रोमन देवी लिबर्टस का प्रतिनिधित्व करती है। यह एक हाथ में मशाल तथा दूसरे हाथ में एक पुस्तक पकड़े हुए है। यह पुस्तक तबूला अंतस है जिसे कानून को पुकारने वाली पुस्तक कहते हैं। यह पुस्तक अमेरिका की आज़ादी ४जुलाई १९७६ को बताती है। स्टेचू के पैरों में टूटी हुई चेन है तथा इसके सिर पर भाले लगा हुआ ताज है।

इस यात्रा में हम लिबर्टी स्टेट पार्क भी देखने गए। रेलवे स्टेशन के नजदीक ही लिबर्टी साइंस सेन्टर है,जो तीन मंजिला है। इन तीन मंज़िलों में एनवायरमेंट,हेल्थ और रिसर्च सामग्री को आम आदमी की समझ के लिए आसान तरीके से प्रदर्शित किया गया है। एक और ख़ास बात यह कि,यहाँ संसार का सबसे बड़ा डोम-थिएटर है। यह अपने-आपमें अकेला ही देखने लायक थियेटर है जिसमें,जहाँ तक नज़र देख सकती है वहाँ तक पूरी गोलाई में इसका पर्दा है। एक अनुभव की दृष्टि से ही यहाँ टेलिस्कोप की कोई ३ डी फ़िल्म भी देखी। यह थियेटर,इसका गोलाकार पर्दा और ३डी फिल्म एक रोमांचक अनुभव था,याद आया नेहरू प्लेनेटोरियम जहाँ गैलेक्सी देखी थी।

सेन्ट्रल रेल रोड टर्मिनल से हमारा स्टीमर एलिस आइलैंड होते हुए लिबर्टी द्वीप लेकर गया था। एलिस आइलैंड १८९२ से १९५४ तक एलिस द्वीप संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे व्यस्त आव्रजन (इमीग्रेशन) स्टेशन था। यह ऊपरी न्यूयॉर्क खाड़ी में स्थित है और इस द्वीप के सबसे निकट न्यू जर्सी है। एलिस द्वीप का एरिया ५८.३८ एकड़ (०.२४ किमी) है। यह हडसन नदी के मुहाने पर है जो न्यूयॉर्क बंदरगाह कहा जाता है। यह अमेरिका के मूल निवासियों के लिए एक तीर्थ स्थान जैसा है इसलिए इसे ‘आशा और आँसू का द्वीप’ कहा जाता है। अमेरिका के इतिहास में इस स्टेशन का बहुत महत्व है। अमेरिका प्रवासियों का देश है जिनमें से ४० प्रतिशत के पूर्वजों ने इसी रेल स्टेशन से देश में प्रवेश किया है। यहाँ से २००० फुट से भी कम दूरी पर लिबर्टी आइलैंड है।प्रवासियों के आने की प्रविष्टि एलिस आइलैंड पर होती थी,जहाँ लगभग पूरे द्वीप पर अब इमीग्रेशन म्यूज़ियम है। दोनों ही भवन ब्रिटिश शिल्प-कला के अच्छे नमूने हैं। यहीं से लौटकर मैंने एक कहानी लिखी थी-एलिस के देश में। एलिस आईलैंड ने जाने कैसे करुणा के भाव जगाये। मन जीवन संघर्ष करनेवालों के प्रति उदास हो गया,परतन्त्रता का दर्द भारतीयों से ज़्यादा कौन समझ सकता है जिनके १०० साल गुलामी के कैसे थे,यह हमारा इतिहास बताता है। याद आये वे क्रांतिकारी जिन्होंने स्वतंत्रता का मोल हमें भी समझाया,मन श्रद्धा से भर गया,मन ही मन उन्हें नमन किया।