ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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सबका संसार ‘माँ’ (‘मातृ दिवस’ विशेष)…
माता तो बस माता होती है,
इनके जैसी नहीं दूजी होती है।
ये बच्चों की परवाह करती है,
ममता स्नेह की मूरत होती है।
मेरे बच्चे सारे जग से अच्छे,
ये उसको बड़ा गुमान होता है।
खुद की तो अब उसे चिंता नहीं,
बच्चे ही उसकी दुनिया होती है।
पहले संतान और सबको खिला कर,
अंत में बचा-कुचा वो खा लेती है।
औलाद के कपड़े, उसकी सेहत,
और शिक्षा की चिंता खूब होती है।
बच्चे पर जरा भी देखे खतरा,
सुरक्षित कवच वो बन जाती है।
बचपन में चाहे जितने प्रश्न करे,
हर संभव जवाब माँ उसे दे देती है।
संतान माता को जितना भी सताए,
दिल से माता तो क्षमा कर देती है।
वही संतान बड़ी होकर के “मेरे लिए,
क्या किया” बेशर्म सवाल करती है।
बड़ी होकर अब वही संतान “तेरी माँ…”
कहकर उनसे पीछा छुड़ा लेती है।
माँ तूने मुझे क्यों नहीं दिए संस्कार!
मुझे पैदा क्यों किया, घटिया सवाल करती है।
व्यस्क होने पर बच्चों को अब माता में,
बस कमियाँ ही कमियाँ दिखाई देती है।
बुढ़ापे में अब तो उसी माता को,
सर छुपाने और रोटी की चिंता होती है।
गर माँ की परवाह आज बच्चे करते,
तो क्योंकर माता वृद्धाश्रम को जाती है।
औलाद की तीखे और कटु वचनों से,
माता का हृदय छलनी हो जाता है।
सभी बच्चे ऐसे नहीं होते, पर ऐसा देख,
कुछ माताओं की रूह कांप जाती है।
मातृ दिवस तो हर रोज होता सही,
बच्चों को उनका कर्तव्य बताया जाता है॥