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एकलव्य बन के देख

राजबाला शर्मा ‘दीप’
अजमेर(राजस्थान)
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तू एकलव्य बन के देख,
लक्ष्य पर संधान करके देख
दिखेगा फिर ना आसमां,
छूटेगी फिर ना ज़मीं
दिल के समंदर में इंकलाब ला के देख।

कोई कह रहा,ना सुन,
अपनी धुन में रह मगन
धीर बन,वीर बन,
व्रती बन,गंभीर बन
बाधाएं आती रहेंगी राह में,
विश्वास का दीपक जला के देख।
दिल के समंदर…

डर के आगे जीत है,
कर्म तेरी प्रीत है
बढ़े चलो,रुको नहीं,
अडिग रहो,झुको नहीं
मार्ग भी तेरा सुलभ हो जाएगा,
लक्ष्य को ताकत बना के देख।
दिल के समंदर…

वक्त का भरोसा क्या ?
पल-पल गुजर रहा
आज कर,अभी कर,
कल की कर तू न फिकर
आँचल में बांध उम्मीदें,
कश्ती भंवर में चला के देख।
दिल के समंदर…

ठान ली,वही तू कर,
लक्ष्य पर टिका नजर
हँसता चल,चलता चल,
प्रीत गीत गाता चल
मंजिल आसान होगी श्रम से,
स्वेद-कण भी बहा के देख।
दिल के समंदर…

काँटों को बुहार ले,
फूलों को भी साथ ले
दीप बन,सीप बन,
सहारा बन,सितारा बन,
जोश से जयघोष कर।
कदम से कदम मिला के देख,
दिल के समंदर…॥

परिचय– राजबाला शर्मा का साहित्यिक उपनाम-दीप है। १४ सितम्बर १९५२ को भरतपुर (राज.)में जन्मीं राजबाला शर्मा का वर्तमान बसेरा अजमेर (राजस्थान)में है। स्थाई रुप से अजमेर निवासी दीप को भाषा ज्ञान-हिंदी एवं बृज का है। कार्यक्षेत्र-गृहिणी का है। इनकी लेखन विधा-कविता,कहानी, गज़ल है। माँ और इंतजार-साझा पुस्तक आपके खाते में है। लेखनी का उद्देश्य-जन जागरण तथा आत्मसंतुष्टि है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-शरदचंद्र, प्रेमचंद्र और नागार्जुन हैं। आपके लिए प्रेरणा पुंज-विवेकानंद जी हैं। सबके लिए संदेश-‘सत्यमेव जयते’ का है।

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