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एक और मजदूर दिवस…

राजबाला शर्मा ‘दीप’
अजमेर(राजस्थान)
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मौन संघर्ष, हाथों में छाले, सम्मान कब ? (मजदूर दिवस विशेष)…

मैं मजदूर, झूठे सपने लिए चलता हूँ,
बेबसी और भूख के घर में पलता हूँ
मौन रहता हूँ, धूप, सर्दी सब सहता हूँ,
गरीबी की चादर उधेड़ता हूँ, सिलता हूँ।

मेहनत इतनी करता है मजदूर,
जब उद्योगपति के घर फूलते-फलते हैं,
पसीना बहाता है श्रमिक तब जाकर,
लोग तिजोरियाँ भर के उन्हें छलते हैं।

अगर यह मजदूर न होते तो,
सोचा है कभी तब क्या होता
न आलीशान महलों का रूतबा होता,
न ताजमहल का कोई नामो-निशां होता।

अनवरत चलता जब छैनी-हथोड़ा,
जीवन उसका संघर्षों से निखरता है
आँखों में सपने, हाथों में छाले लिए,
उम्रभर वह हादसों से गुजरता है।

न कोई मान, न कोई सम्मान है,
लोकतंत्र है, हक न मिल पाता है।
शहरों का सृष्टा, राष्ट्र का निर्माता,
उसके जख़्म न कोई सिल पाता है॥

परिचय– राजबाला शर्मा का साहित्यिक उपनाम-दीप है। १४ सितम्बर १९५२ को भरतपुर (राज.)में जन्मीं राजबाला शर्मा का वर्तमान बसेरा अजमेर (राजस्थान)में है। स्थाई रुप से अजमेर निवासी दीप को भाषा ज्ञान-हिंदी एवं बृज का है। कार्यक्षेत्र-गृहिणी का है। इनकी लेखन विधा-कविता,कहानी, गज़ल है। माँ और इंतजार-साझा पुस्तक आपके खाते में है। लेखनी का उद्देश्य-जन जागरण तथा आत्मसंतुष्टि है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-शरदचंद्र, प्रेमचंद्र और नागार्जुन हैं। आपके लिए प्रेरणा पुंज-विवेकानंद जी हैं। सबके लिए संदेश-‘सत्यमेव जयते’ का है।