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एक सुखद शाम और कवि-गोष्ठी ने दिया आनंद

नई दिल्ली।

हिंदी के वरिष्ठतम १०० वर्षीय साहित्यकार रामदरश मिश्र और ९५ वर्षीय श्रीमती सरस्वती की पवित्र छाँव में मन और प्रेमिल हुआ। कितने ही प्रसंग छिड़े। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की भगोना भर चाय या फिर हिंदी के अन्य पुराने साहित्यकारों के मोहक अलिखित किस्से, सब कुछ ऐसा था मानो अपनी आँखों के सामने हम हिंदी साहित्य के सौ स्वर्णिम वर्षों का इतिहास देख रहे हों।
प्रो. रामदरश मिश्र के निर्देशन से कवि-समीक्षक ओम निश्छल के सानिध्य में कवि-गोष्ठी की शुरुआत हुई। नवोदित कवि केतन यादव ने ‘मृत्यु’ शीर्षक से २ कविताएँ पढ़ीं-
कहीं पर, किसी में
बचा रहना जीवन है
और धीरे-धीरे खत्म होना मृत्यु।
डॉ. रेनू यादव ने ‘गादुर’ कविता प्रस्तुत की-
बीरबल की खिचड़ी
फिर भी दूर जलती अग्नि की आस में
सिक जाती है
पर इनकी खिचड़ी
सूर्य के प्रकाश से रहती है
सदैव वंचित।
तदोपरांत गोष्ठी में ओम निश्चल ने ‘जी चाहता है’ शीर्षक से एक प्यारी रचना प्रस्तुत की-
कभी मिल के रोने को जी चाहता है
कभी दिल भिगोने को जी चाहता है।
सर्व भाषा ट्रस्ट के केशव मोहन पांडेय ने ‘माँ बड़ी होती है’ शीर्षक से बहुत भावुक कविता पढ़ी-
जब मैं
उसके ‘अपने ज़माने’ की बातों पर
लगाम लगाना चाहता
तो उम्र में कच्चा कहती है,
माँ मुझे आज भी बच्चा कहती है।
गोष्ठी का सबसे सुखद क्षण था अपने हिंदी के मार्तण्ड प्रो. मिश्र को सुनना। उनसे रचनाएँ सुनीं-
‘आज तो जिंदगी, जिंदगी हो गयी’ ग़ज़ल की कुछ पंक्तियाँ-
तुम मिले तो घड़ी रंगीं हो गई
आज तो जिंदगी, जिंदगी हो गई।

हिन्दी का १०० वर्षीय कवि प्रेमी-युगल आँखों के सामने था। सभी प्रो. मिश्र के आशीर्वाद-अमृत से देर तक सिक्त होते रहे।

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