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कन्या पूजन श्रेष्ठतर

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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नवरात्रि विशेष….

भारत में कन्या पूजन की परम्परा अनादि काल से या यूँ कहें आदि सृष्टि की कल्पना ही कन्या सृष्टिजा के रूप में रही है। श्रद्धा, ममता, करुणा, दया, क्षमा, चिन्ता, लज्जा, माया और जननी आदिशक्ति लक्ष्मी के रूप में कुमारी कन्या का पूजन, वन्दन होता रहा है। जगद्जननी आदिशक्ति की कौमार्य रूप की आराधना माॅं अधिष्ठात्री वैष्णवी के रुप में होती है। दुराचार, भ्रूण पतन, दुष्कर्म आदि मनरोगी दानवीय मानसिकता से लाखों गुणा श्रेष्ठ कन्या पूजन भारतीय संस्कृति और सभ्यता का परिचायक है। नवदुर्गा नव महाशक्ति स्वरूपा सती सावित्री गिरिजा भवानी की बालरूप अवतार आराधना ही कुमारी कन्या पूजन का सार रहा है। महादुर्गाष्टमी के दिन और महानवमी के दिन सनातनधर्मी पुरुष और महिलाएँ आदिकाल से अद्यपर्यन्त कुमारी बाल कन्याओं का सोलह श्रंगार कर उनको वस्त्रा- भूषणों, कुंकुम और चन्दनादि से पूजनकर माँ जगदम्बा नवदुर्गा लक्ष्मी भवानी की भक्ति और प्रेम भाव से पूजार्चना करते हैं। सकल परिवार, बन्धु-बान्धवों और सम्पूर्ण संसार के रोग, शोक, पीता, बन्धन, व्यसन और लोभग्रसित संसार को नष्टकर सम्पूर्ण संसार में सदैव सुख, शांति, पुरुषार्थ, परमार्थ, खुशी मुस्कान सह मानवता नैतिकता की स्थापनार्थ प्रार्थना करते रहे हैं। कुमारी बाल कन्या को स्वादिष्ट खीर, मिष्टान्न, फलादि परोस कर भोजन कराते हैं और पूजन दक्षिणादि देकर, साथ ही सादर विनत प्रणाम कर उनका स्नेहाशीष लिया जाता है। वस्तुत: बाल कुमारी कन्या में हम जननी, तनया, वधू, बहिन, सीता, गीता, रिद्धि-सिद्धि सर्व मंगला, स्वाहा, स्वधा, मर्यादा, सीमा, प्रतिष्ठा, कुलधायिका, साक्षी, सहजा , वेदना, संवेदना शिवा जसप्रीत अपर्णा गौरी के रुप में देखते हैं। नारी सृष्टि का आधार, पालक और संहारक है। शान्ति-सौहार्द्र, प्रीति-रीति औदार्य और सहनशीलता का प्रति- मानक है। अत: श्रद्धा प्रेम और भक्ति की मानक कुमारी कन्या पूजन और भोजन सनातनी अटूट विश्वास, नारी सम्मान और धरिणी के रूप में उनकी गरिमा और अतुलनीय महिमा का परिचायक है। अन्य धार्मिक अवसरों पर भी कन्या पूजन और भोजन सह प्रदेय दक्षिणा की सात्त्विक परम्परा है।

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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