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करें प्रकृति श्रृंगार

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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मेरा पर्यावरण, मेरी जान (विश्व पर्यावरण दिवस विशेष)…

पुरखों से मिली थी हमें
मुस्कुराती हरी-भरी धरती,
निर्मल वातावरण और प्राकृतिक संपदा से हमें संपन्न करती।

प्रकृति के असीम उपवन को
स्वार्थवश हमने क्षीण किया,
हरितिमा की करुण पुकार को
नीरवता में परिवर्तित किया।

विकास के उन्मत्त रथ पर
विनाश का ध्वज लहराया,
कौन समझे यह मौन वेदना ?
स्वार्थ ने सबको चुप कराया।

न सोचा नवागंतुकों के विषय में
हम उन्हें धरोहर में क्या दे जाएँगे ?
हाहा-कार करता प्रदूषण और
स्वार्थ का पाठ पढ़ा ही पढ़ाएँगे।

सजग हो करें प्रकृति श्रृंगार और,
कोने-कोने में वृक्ष खूब लगाएँ।
प्रदूषण को कम करने के लिए
धरा को अपनी हरा-भरा बनाएँ॥