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कल-कल करती नदिया

तारा प्रजापत ‘प्रीत’
रातानाड़ा(राजस्थान) 
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पर्वत के वो शिखर से निकले
धरती के सीने पर फिसले,
कोई उससे कुछ भी कह ले
सबकी बातें हँस कर सह ले।
इसकी कहानी कहेंगी सदियां,
कल-कल करती बहती नदिया॥

इठलाती-बलखाती चलती
कभी-कभी वो ख़ूब मचलती,
उसके जल से दुनिया पलती
हरदम बहती,कभी न थकती।
इसकी कहानी कहेंगी सदियां,
कल-कल करती बहती नदिया॥

सृष्टि को वो जीवन देती
सबके कष्टों को हर लेती,
बदले में वो कुछ नहीं लेती
सबको भर-भर झोली देती।
इसकी कहानी कहेंगी सदियां,
कल-कल करती बहती नदिया॥

जननी जगत पावन कहलाती
मन की तपिश शीतल कर जाती,
अनन्त,अथक ये बहती जाती
सागर से मिल मंज़िल को पाती।
इसकी कहानी कहेंगी सदियां,
कल-कल करती बहती नदिया॥

गंगा,जमुना,सरस्वती मिल जाती
त्रिवेणी संगम कहलाती,
अपना जल वो सबको पिलाती
जिसकी महिमा दुनिया गाती।
इसकी कहानी कहेगी सदियां,
कल-कल करती बहती नदिया॥

गोद में जिसने हमको पाला
हमने उसे दूषित कर डाला,
पड़ गया क्यों अक़्ल पे ताला
लेगा हिसाब वो ऊपर वाला।
इसकी कहानी कहेगी सदियां,
कल-कल करती बहती नदिया॥

परिचय– श्रीमती तारा प्रजापत का उपनाम ‘प्रीत’ है।आपका नाता राज्य राजस्थान के जोधपुर स्थित रातानाड़ा स्थित गायत्री विहार से है। जन्मतिथि १ जून १९५७ और जन्म स्थान-बीकानेर (राज.) ही है। स्नातक(बी.ए.) तक शिक्षित प्रीत का कार्यक्षेत्र-गृहस्थी है। कई पत्रिकाओं और दो पुस्तकों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं,तो अन्य माध्यमों में भी प्रसारित हैं। आपके लेखन का उद्देश्य पसंद का आम करना है। लेखन विधा में कविता,हाइकु,मुक्तक,ग़ज़ल रचती हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-आकाशवाणी पर कविताओं का प्रसारण होना है।