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कहाँ खो गए वो ढोल-मंजीरे..वो गीत..

डॉ. स्वयंभू शलभ
रक्सौल (बिहार)

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हमारे देश के व्रत-त्योहार हमारी गौरवशाली परम्परा और संस्कृति का दर्पण हैं। देश की अनेकता में एकता की जो झाँकी दिखाई देती है उसमें हमारी समृद्ध परम्पराओं और पर्वों का विशेष योगदान है। पहले तो गांवों में वसंत पंचमी से ही फागुनी गीतों की बयार बहने लगती थी। महीनेभर पहले से ही चौपालों पर ढोल-मंजीरे की थाप के साथ जोगीरा गूंजने लगता था। फाग,मल्हार,झूमर,चैता और बारहमासा जैसे विभिन्न रागों में भारतीय लोक संस्कृति की बहुरंगी झलक दिखाई देती थी। साथ मिलकर गाने बजाने वाले लोगों के बीच आपसी प्रेम और सौहार्द भी खूब झलकता था।
बदलते दौर में फागुनी गीतों की जगह भोजपुरी के फूहड़ और अश्लील गीतों ने ले ली है। अश्लील गीत लिखने और गाने वालों ने सारी हदें पार करते हुए हमारी परम्परा और अस्मिता पर ही हमला बोल दिया। डर है कि होली के रंग-गुलाल और गीत-संगीत की मधुरता इस फूहड़ शोर में कहीं खो न जाए।
आज ऐसे गीतों के सीडी,डीवीडी,आडियो,वीडियो और एलबम से बाजार भरे पड़े हैं। कहीं डेक तो कहीं डीजे पर ऐसे गीत गूंज रहे हैं। कुछ लोग इस फूहड़पन में भी आनंद ले रहे हैं। क्या शहर,क्या गांव,हर चौक चौराहे पर ऐसा नजारा दिखने लगा है।
परिवार या बच्चों के साथ इन टोलियों के सामने से गुजर गए तो शर्मशार होना तय है। समस्या इनके नाचने-गाने से नहीं है। होली तो त्यौहार ही है आनंद और उमंग का। समस्या उन फूहड़ गानों से है जिन पर ये लोग मगन हैं बिना यह सोचे कि ये गाने हमारी परम्पराओं को किस गर्त में ले जा रहे हैं।
यह सिलसिला अब यहीं तक सीमित नहीं है। शादी- ब्याह के पंडालों से लेकर बैंड बाजे वालों तक इन गानों की पैठ हो चुकी है।
जगह-जगह आयोजित होने वाली दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा के आयोजनों में भी मूर्ति विसर्जन के समय लड़के ऐसे अश्लील गानों पर झूमते-नाचते नजर आ जाते हैं। पंडालों में इन गानों के तर्ज़ पर भक्ति गीत सुनाई देने लगे हैं। आस्था और भक्ति भी इन अश्लील गानों की भेंट चढ़ने लगी है।
पैसों के लिए अपनी भाषा की गरिमा को धूल में मिलाने वाले,सस्ती लोकप्रियता के भूखे ऐसी फिल्में बनाने वाले,ऐसे गीत लिखने और गाने वाले इस पीढ़ी को बरबाद करने पर तुले हैं। इन लोगों की वजह से भोजपुरी भाषा-भाषी क्षेत्रों की छवि पूरे देश में खराब हो रही है।
यहां बड़ा सवाल यह भी है कि आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता फैलाकर हमारी मातृभाषा और हमारी संस्कृति के साथ खिलवाड़ करने का हक इन्हें किसने दिया। ये न्यायालय के सामने भी दोषी हैं और समाज के सामने भी। इन्हें दंड भी न्यायालय और समाज दोनों द्वारा मिलना चाहिए।
वाहनों में या सार्वजनिक स्थलों पर द्विअर्थी भोजपुरी गीत बजाने को लेकर पटना उच्च न्यायालय ने भी सख्ती दिखाई है लेकिन,सरकार और प्रशासन चाहे जो भी कदम उठाये यह प्रयास तब तक सफल नहीं होगा जब तक कि हम सब मिलकर ऐसी फिल्मों,ऐसे गानों का पूर्ण रूप से बहिष्कार नहीं करेंगे।
यह समय की मांग है कि अश्लीलता मुक्त भोजपुरी अभियान को हर गांव,हर शहर में शुरू किया जाए, तभी शायद हम एक सभ्य समाज में जीने का दावा कर सकेंगे।
हर सामाजिक संघ,संगठन को खुलकर इस अभद्रता के खिलाफ आगे आना चाहिए। छात्र संगठनों को तो इसे मुख्य मुद्दा बनाना चाहिए। साथ ही विभिन्न संघ-संगठनों द्वारा उन गीतकारों,गायकों एवं फिल्मकारों को सम्मान देने की एक स्वस्थ परम्परा भी शुरू की जानी चाहिए,जो हमारी क्षीण होती लोक संस्कृति को बचाने में लगे हैं।