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हौसले से भरपूर मेरा भाई

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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‘विश्व भाई दिवस’ विशेष…

मैं विनय से आठ वर्ष बड़ी हूँ, हम छः बहन-भाइयों में विनय पाँचवें हैं।मेरा बचपना ही था जब विनय का जन्म हुआ। कभी अपनी सहेलियों के साथ खेलने निकलने लगती तो माँ कहती विनय को भी साथ ले जा, मैं तब तक घर का कुछ काम निपटा लूँ। बिलकुल अच्छा नहीं लगता था कि अब मैं खेलूँगी या इसे देखूँगी, पर मेरी सखियाँ इसे बड़े प्यार से खिलाती थी।
देखने में सुंदर और उस पर घुँघराले बाल, सब इसे खिलाने के लिए उतावली रहतीं।
मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार-हम ४ बहनें और २ भाई, माता-पिता और दादी, इतने लोग साथ रहते थे।पुश्तैनी मकान प्रतापगढ़ में था, पर हम सबकी शिक्षा के विषय में सोच कर पिताजी परिवार सहित इलाहाबाद आ गए थे। रेलवे में नौकरी करते थ। विनय सदैव से कक्षा में अच्छे अंक लाया करता, सब कुछ ठीक ही चल रहा था।विनय सबके लाड़ले थे, जब पिता जी कभी अपने मित्रों से मिलने जाते तो विनय को साथ ले जाते।शेरो-शायरी के शौक़ीन थे मेरे पिता जी। उर्दू की अच्छी पकड़ थी, लिखा भी करते थे और अपने मित्रों के साथ जब बैठते, तब सुनाया भी करते थे। विनय तब छोटे थे, पर वो कहते हैं कि कहीं न कहीं माता-पिता के व्यक्तित्व के
कुछ गुण बच्चों में स्वाभाविक रूप से आ ही जाते हैं। जिन घरों में सदाचार, शिष्टता जैसे मूल्यों की बहुलता होती है, वहाँ बालक में वैसे ही संस्कार अंकुरित होते हैं और उसका साक्षात् प्रमाण है विनय।
   अचानक परिवार पर भारी संकट आ पड़ा। एक छोटी-सी बीमारी में पिताजी हम सबको छोड़ परलोक सिधार गए। यह परिवार के लिए परीक्षा का समय था। एक भाई जो मुझसे बड़ा था, वह जीईसी नैनी में सेल्स मैनेजर के पद पर काम करने लगे थे, शेष सभी पढ़ रहे थे।
विनय उस समय १० वर्ष के थे।
परिवार के सभी सदस्यों के सहयोग से हम सबने इस चुनौतीपूर्ण समय को स्वीकार किया। माँ अपना दर्द भुला कर हम सबका भविष्य बनाने में लग गई, शायद माँ ने अपने सारे दुःख को पी लिया था। बाहर से पर्वत की तरह दिखने वाली माँ के भीतर कितनी नदियाँ जज्ब़ थीं, वह मैं ही जानती थी। मेरी शादी हो गई तथा मुझसे छोटी बहन को पिताजी के स्थान पर रेलवे में नौकरी मिल गई। तब विनय मोतीलाल नेहरू इंजीनियरिंग कॉलेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने लगे।   विनय सदैव से स्पष्ट बोलने वाले थे। बहुत मिलनसार, दूसरों की सहायता करने वाला, अपनी ज़िम्मेदारियों को समझने वाला और बड़ों का आदर करने वाला था। अपनी धुन का पक्का, जो काम सोच लिया वह किसी भी हाल में करना ही है।पूजा-पाठ और पंडितों के क्रियाकलापों में विनय को तनिक भी विश्वास नहीं था और आज भी नहीं है। विनय निरंकारी समाज के समर्थक हैं और जब समागम वगैरह होता है तो उसमें सम्मिलित भी होते हैं। एक बात और कहना चाहूँगी कि विनय के एक मित्र की भूमिका विनय के जीवन में बहुत मायने रखती है। यह मित्रता तब से है जब ये दोनों सात-आठ साल के रहे होंगे, संयुक्त परिवार और कपड़ों का कारोबार था। मुश्किल समय में सदैव वह मित्र इनके साथ खड़ा मिला और बाद में तो वह परिवार का एक सदस्य ही हो गया और यह दोस्ती आज भी क़ायम है।
   शादी के बाद मैं पति के साथ जबलपुर में रहने लगी थी। पढ़ाई समाप्त करने के बाद विनय एनटीपीसी में काम करने लगे और बड़े भाई के साथ परिवार की ज़िम्मेदारियों को पूरा करने में लग गए। समय के साथ-साथ सारे कार्य पूर्ण हुए, विनय की भी शादी हो गई। सबकी शादी के पश्चात् १९९७ की दिसंबर में माँ ने भी आँखें बंद कर लीं।
   विनय ने कई अन्तर्राष्ट्रीय कंपनियों में विभिन्न शहरों में ४३ वर्षों तक काम किया। सेवानिवृत्ति के पश्चात विनय गुड़गांव में रहते हैं।
  ‘कोरोना’ काल में अगस्त २०२० में विनय ने लिखना आरम्भ किया।
विनय की पुस्तक ‘दिल की आवाज़’ जुलाई २०२१ में, दूसरी ‘दिल के अल्फ़ाज’ दिसंबर २०२१ में, तीसरी ‘सुकून-ए-दिल’ अगस्त २०२२ में,  चौथी ‘हाल-ए-दिल’ नवंबर २०२२ में और पाँचवीं ‘दास्तान-ए-दिल’ नवंबर २०२३ में प्रकाशित हुई है जो उनकी नज़्मों और ग़ज़लों के संग्रह हैं।
   बचपन से ही ऐसा माहौल बनता गया कि विभिन्न प्रकार के अनुभव एकत्रित होते रहे, जो उनकी ग़ज़लों और नज़्मों में नज़र आते हैं। ज़िंदगी के तमाम पहलुओं को छूती हुई उनकी रचनाएँ अनायास ही पाठक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। विनय ने अपनी ग़ज़ल में अपने अनुभवों पर अधिक बल दिया है। विनय विभिन्न मंचों पर अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं और वो अनेक सम्मान से नवाज़ा गया है।
  मेरे भाई विनय की उपलब्धियाँ अनायास ही यह सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं, कि यदि किसी के अंदर कुछ करने का हौसला हो तो वह कुछ भी कर सकता है।