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कहानियों में स्थानीय बोलियों का उपयोग किया जाना चाहिए- डॉ. श्रीवास्तव

भोपाल(मप्र)।

गद्य प्रवाह मंच पर विलुप्त प्राय विधाओं जैसे डायरी, रिपोर्ताज, और रेखाचित्र आदि पर भी कार्यशाला की तरह कार्य किया जाना चाहिए।कहानियों में सिर्फ सामाजिक दर्पण ही नहीं दिखाए जाएं, बल्कि समाधान पर लेखनी चलाकर पाठक को एक दिशा भी देने की जरूरत है, साथ ही कहानी में पात्र के अनुरूप स्थानीय बोलियों का भी प्रयोग किया जाना चाहिए।
यह बात प्रवाह मंच की आभासी गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार डॉ. स्नेहलता श्रीवास्तव (इंदौर) ने कही। गोष्ठी में सरस्वती वंदना ऊषा चतुर्वेदी जी ने सस्वर प्रस्तुत की। स्वागत वक्तव्य उपाध्यक्ष चरणजीत सिंह कुकरेजा ने दिया। मुख्य अतिथि साहित्यकार आशा सिन्हा कपूर ने कहानियों की तारीफ करते हुए कहा कि, कहानी में कामकाजी महिलाओं का भी रिश्तों के प्रति दर्द झलकता है। कहानी पाठ श्रीमती शेफालिका श्रीवास्तव ने विदेश की धरती से किया। इसकी समीक्षा प्रबुद्ध साहित्यकार साधना शुक्ला ने की। दूसरी कहानी का पाठ स्थापित कहानीकार सुनीता मिश्रा ने किया। इसकी समीक्षा कोलकाता से अनामिका सिंह ने की।
समूह की संयोजक जनक कुमारी सिंह बघेल तथा सचिव कमल चंद्रा ने अध्यक्ष और अतिथि को आभासी पुष्प गुच्छ भेंट कर सम्मानित किया। संचालन अध्यक्ष मधुलिका श्रीवास्तव ने किया। आभार सुधा दुबे ने अभिव्यक्त किया।

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