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कैसे ये सुलझाऊँ ?

अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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कई सवाल
कैसे ये सुलझाऊँ
रोज बवाल।

ये टूटे रिश्ते
कितना भी संभालूं
छूटते रिश्ते।

वक्त के ज़ख्म
आखिर कब तक ?
निभाएं हम।

रूप ही भला
मन कौन देखता ?
सबक मिला।

कैसे ठहरें ?
यूँ उतार-चढ़ाव
जैसे लहरें।

प्रेम परीक्षा
ऐसे जियो-वैसे न
दूजों की इच्छा।

यकीन नहीं
साथ चलेंगे सब
सिद्ध हो कैसे ?

जीवन चक्र
हार-जीत भावना
है दृष्टि वक्र।

ख़्वाब अनेक
किधर चलें हम
है रास्ता एक।

लगाई अर्जी
कृपा ईश्वर मर्जी
जो बरसेगी॥