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कौन देगा हिसाब ?

अजय जैन ‘विकल्प
इंदौर(मध्यप्रदेश)
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फिर जल गई कई जिंदगी,
कौन देगा हिसाब…
बस ढोलेंगे जिम्मेदारी,
कौन मानेगा अपनी गलती ?

लील गई लापरवाही की आग,
मौत से बचने कॆ लिए भी पाई मौत…
कोई नहीं मानता,कोई नियम,
फिर उजड़ गए फूलों कॆ कई बाग।

क्या होगा ! बस खानापूर्ति,
देखते रहे ‘सूरत’ में हादसा,लेकर सूरत…
आश्चर्य…क्या इंसान हैं हम,
कोई मानवता-कर्त्तव्य नहीं।

हर बार गलती,हर बार बात,
कौन करेगा मासूमों की भरपाई…
शर्मनाक…सूख रहा संवेदी मन,
चलानी होगी सख्त नियमों की लात।

मुआवजा नहीं लौटाता कभी भविष्य,
जैसे नहीं भरते जख्म कॆ निशां…
मत कीजिए श्रद्धासुमन का ढोंग,
बदलना हुआ जरुरी अब बहरी व्यवस्था को॥