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क्या तुझे भी दीवाना याद आता है…

सलिल सरोज
नौलागढ़ (बिहार)

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कोई क़यामत न कोई करीना याद आता है।
जब दुपट्टे से तेरा मुँह छिपाना याद आता है।

एक लिहाफ में सिमटी न जाने कितनी रातें,
यक ब यक दिसम्बर का महीना याद आता है।

ज़ुल्फ़ की पेंचों में छिपा तेरा शफ्फाक चेहरा,
किसी भँवर में पेशतर सफीना याद आता है।

छाती,सीना,नाफ,कमर सब के सब लाजवाब,
उर्वशी,मेनका,रम्भा का ज़माना याद आता है।

जिस तरह मैं हो गया हूँ तेरे हुस्न का कायल,
क्या तुझे भी मुझ-सा दीवाना याद आता है॥

परिचय-सलिल सरोज का जन्म ३ मार्च १९८७ को बेगूसराय जिले के नौलागढ़ गाँव में(बिहार)हुआ है। आपकी आरंभिक शिक्षा कोडरमा (झारखंड) से हुई है,जबकि बिहार से अंग्रेजी में बी.ए तथा नई दिल्ली से रूसी भाषा में बी.ए सहित समाजशास्त्र में एम.ए.भी किया है। एक निर्देशिका का सह-अनुवादन,एक का सह-सम्पादन,स्थानीय पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन किया है। सामाजिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार एवं ज्वलन्त विषयों पर पैनी नज़र ही आपकी सम्प्रति है। सोशल मीडिया पर साहित्यिक धरोहर को जीवित रखने की अनवरत कोशिशकरते हैं। ३० से अधिक पत्रिकाओं व अखबारों में इनकी रचनाओं का निरंतर प्रकाशनहो चुका है। भोपाल स्थित फॉउंडेशन द्वारा अखिल भारतीय काव्य लेखन में गुलज़ार द्वारा चयनित प्रथम २० में आपको स्थान मिला है। कार्यालय की वार्षिक हिंदी पत्रिका में भी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।