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क्या नेता, क्या दफ़्तर!

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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एक दिन हमारे एक परिचित घर आये,
घूसख़ोरी के कई रोचक क़िस्से सुनाये
क्या नेता ,क्या अफ़सर, क्या क्लर्क, क्या दफ़्तर!
हर जगह घूस का बोलबाला है
देश की नैतिकता का इसीलिए निकला दिवाला है।

पास बैठी मैं भी सब बातें सुन रही थी,
मन में उनकी नैतिकता के ताने-बाने बुन रही थी
इस विषय पर अपना नज़रिया दर्शाने के लिए उत्सुक हो रही थी,
कथनी-करनी में कितना अंतर होता है सब प्रत्यक्ष देख रही थी।
मैंने कहा-हमारे लिए ये कौन-सी नई व्यथा है ?
इस देश में प्राचीन काल से चली आ रही प्रथा है।

यह घूसख़ोरी हमारे बीच ही उपजी है कहीं बाहर से नहीं आयी है,
हमारे पूर्वजों ने ही समय-समय पर हमें ये विद्या सिखायी है
बड़े-बड़े उपहार देकर अपना उल्लू सीधा करवाते थे,
जो इस कला में पारंगत होता उपाय उसी से पूछे जाते थे
घूस ले लेकर आपस में लड़वाते थे,
हर बार देश का अहित किये जाते थे
फ़र्क़ इतना है कि पहले गिने-चुने लोग थे,
जो इस तरह का काम करते थे
अब इसका उल्टा हो गया है,
कुछ लोग ही सीधी-सादे हैं।
बाकी स्वयं के लिए कुछ भी करते हैं,
इसी में अपना बड़कपन समझते हैं॥