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गद्दार हो तुम

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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गद्दार हो तुम, गद्दार हो तुम,
भारत विशाल के
भारत महान के,
खाते हो यहाँ
रहते हो यहाँ,
पर मन बसता
उस जहाँ,
धर्म है अपना जहाँ
यह देश है,
धर्मनिरपेक्ष
बसती है यहाँ,
सारे धर्मों की थाती,
जाति अलग-अलग
पर देश है एक,
भारत महान
जहाँ हर व्यक्ति,
व्यक्ति है स्वतन्त्र
निभाने का,
धर्म यहाँ अपना
पर क्यों तुम करते हो ?
गद्दारी, गद्दारी।
गद्दार हो तुम, गद्दार हो तुम…
भारत महान के,
भारत विशाल के…

आस्था जब है,
भारत से
रहते हो जब भारत में,
सुख-दुःख का साथ है तेरा
पर क्यों करते हो गद्दारी-मक्कारी,
यह किसने सीख दी ?
फूट कराओ,
फूट कराओ
भाई-भाई में,
फूट कराओ
यह कैसी संस्कृति
सीखी है तुमने ?
यह भारत की नहीं,
यह देन है पश्चिम की
अपनी संस्कृति सीखो,
और सुधारो चाल अपनी
नहीं तो टिक न पाओगे,
इस देश की धरती पर।
गद्दार हो तुम, गद्दार हो तुम…
भारत विशाल के,
भारत महान के…

समय रहते चेत जाओ,
ओ देश के गद्दारों
यह देश है वीर जवानों का,
विध्वंस करके रख देंगें
तेरी हर चाल,
फिर ना कहना-
भारत की गलती।
गद्दार हो तुम, गद्दार हो तुम…
भारत विशाल के,
भारत महान के॥