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गद्य शैली के प्रमुख विधायक राजा लक्ष्मण सिंह

प्रो. अमरनाथ,
कलकत्ता( पश्चिम बंगाल)
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हिन्दी योद्धा-पुण्यतिथि विशेष

आगरा (उप्र) के वजीरपुरा नामक स्थान में जन्मे, आगरा में पढ़-लिखे राजा लक्ष्मण सिंह (९-१०-१८२६, १४-७-१८९६) को ‘राजा’ की उपाधि भी अंग्रेजों की ओर से ही मिली थी। वे भारतेन्दु-युग पूर्व हिन्दी गद्य शैली के प्रमुख विधायक के रूप में जाने जाते हैं। पढ़ाई के बाद पश्चिमोत्तर प्रदेश के लेफ्टिनेंट गवर्नर के कार्यालय में पहले अनुवादक, फिर इटावा के तहसीलदार और बाद में डिप्टी कलेक्टर के पद तक पहुँचे। १८५७ की क्रान्ति में उन्होंने अंग्रेजों का भरपूर साथ दिया, पुरस्कार स्वरूप उन्हें डिप्टी कलेक्टरी मिली। राजा लक्ष्मण सिंह ने १८६१ ईं. में आगरा से ‘प्रजा हितैषी’ नाम का पत्र निकाला। महाकवि कालिदास की विश्व-प्रसिद्ध कृति ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का उन्होंने ‘शकुन्तला’ नाटक नाम से अनुवाद किया। इसमें हिन्दी के स्वरूप को देखकर लोगों का ध्यान इनकी भाषा की ओर गया। १८७५ ईं. में प्रसिद्ध हिन्दी प्रेमी फ्रेडरिक पिंकाट ने इसे इंग्लैड से प्रकाशित कराया। इस कृति से लक्ष्मण सिंह को काफी ख्याति मिली और इसे इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा में पाठ्य पुस्तक के रूप में स्वीकार किया गया। इन्होंने ‘रघुवंश’ महाकाव्य का भी हिन्दी में अनुवाद किया और इसकी भूमिका में अपनी भाषा संबंधी नीति स्पष्ट करते हुए हिन्दी को उर्दू से न्यारी केवल हिन्दुओं की बोली घोषित किया और उसमें से प्रयत्नपूर्वक अरबी-फारसी के चिर परिचित तथा सर्वग्राह्य शब्दों को भी अलग कर दिया। उनका मत है- “हमारे मत में हिन्दी और उर्दू २ बोली न्यारी-न्यारी हैं। हिन्दी इस देश के हिन्दू बोलते हैं, और उर्दू यहाँ के मुसलमानों और फारसी पढ़े हुए हिन्दुओं की बोलचाल है। हिन्दी में संस्कृत के पद बहुत आते हैं उर्दू में अरबी-फारसी के, परन्तु कुछ आवश्यक नहीं है कि अरबी- फारसी के शब्दों बिना हिन्दी न बोली जाय और न हम उस भाषा को हिन्दी कहते हैं जिसमें अरबी-फारसी के शब्द भरे हैं।”
इस प्रकार लक्ष्मण सिंह का भाषा विषयक आदर्श राजा शिवप्रसाद से सर्वथा विपरीत था। जिन शब्दों के विषय में राजा साहब की धारणा थी कि, वे जनता में अधिक प्रचलित हैं, केवल विदेशी होने के कारण उन्होंने उन्हें भी हिन्दी के अन्तर्गत स्वीकार करने में हिचक दिखाई। फलस्वरूप ‘गवाह’, ‘अदालत’, ‘कलक्टर’ जैसे शब्द भी उन्हें मान्य नहीं हुए। विकसित होती हुई भाषा के लिए यह दृष्टिकोण कितना घातक हो सकता है इसका सहज अनुमान किया जा सकता है। इस तरह उन्होंने लोक प्रचलित हिन्दी को हिन्दू संस्कृति के अनुकूल संस्कृतनिष्ठ बनाने की भरपूर कोशिश की। बाद में लक्ष्मण सिंह ने कालिदास के ‘मेघदूत’ का भी चौपाई, दोहा, सोरठा, शिखरिणी, सवैया, छप्पय, कुंडलिया और घनाक्षरी जैसे छंदों में पद्यानुवाद किया। इसमें अवधी और ब्रजभाषा के शब्दों का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। यह अपने ढंग का अनूठा प्रयोग था। लक्ष्मण सिंह की भाषा नीति की विशेषताएं बताते हुए डॉ. रामचंद्र तिवारी ने लिखा है,-“आपका गद्य परिमार्जित नहीं है। उसमें ब्रजभाषापन बना हुआ है। आपने ‘कण्व’ के स्थान पर ‘कन्व’, आश्चर्य’ के स्थान पर ‘अचरज’, ‘गुण’ के स्थान पर ‘गुन’ और ‘पश्चाताप’ के स्थान पर ‘पछताव’ शब्दों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार ‘पर’ के स्थान पर ‘पै’ विभक्ति चिह्न का प्रयोग किया है और ‘पूछा चाहती हूँ’, ‘काम कीजो’, ‘जाना कहा है’ आदि क्रिया पदों का प्रयोग क्रमश: ‘पूछना चाहती हूँ’, ‘काम करना’, ‘जाने को कहा है’ आदि पदों के लिए किया है। ऐसा ब्रजभाषा के प्रभाव स्वरूप ही हुआ है। उर्दू-रहित होते हुए भी आपका गद्य संस्कृतनिष्ठ नहीं है और उसमें ‘गगरी’, ‘गण्डा’, ‘डिब्बा’, ‘ढीठ’, ‘आरबल’, ‘टहलुआ’ जैसे ठेठ बोल-चाल के शब्दों का प्रचुर प्रयोग किया गया है। यही कारण है कि सब मिलाकर आपकी भाषा जनता के अधिक निकट है।” ( साहित्य कोश, भाग-२, पृष्ठ-५१२) डॉ.रामचंद्र तिवारी का अनुमान है कि, “भारतेन्दु को अपना पथ-प्रशस्त करने में राजा शिवप्रसाद की अपेक्षा राजा लक्ष्मण सिंह से अधिक प्रेरणा मिली होगी।”

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई)