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घरौंदा

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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लघुतर स्वप्नों खोया जीवन, क्षुधार्त तृषाकुल पथ जाता है,
कहाँ घरौंदा लावारिस पथ, बदनसीब स्वयं सिहरता है।

कहाँ वास उपहास सामाजिक, कहाँ गात्र वसन ढँक पाता है,
गर्मी बरखा ठिठुरन कम्पित, दुर्भाग्य कफ़न बन जाता है।

आह्लाद कहाँ अवसादित मन, बस व्यथा कथा रच जाता है,
बस अन्तर्नादित सिसकी बन, मन टीस जख़्म दे जाता है।

कर्त्तव्य निरत अधिकार विरत, दुत्कार मुदित मुस्काता है,
आनंद कहाँ दुर्दिन जहां, स्वाधीन शर्म झुक जाता है।

संविधान वृथा दुर्दांत दशा, बस सत्ता में फँस जाता है,
हर पाँच साल फिर से चुनाव, बस राजनीति झुक जाता है।

बन जाए घरौंदे सर्व सुलभ, विश्वास आश दे जाता है,
कल्याण कहाँ अनजान यहाँ, बचपन अबोध बस रोता है।

जठराग्नि ज्वलित अज्ञान तिमिर, घरौंदा यतीम दे पाता है,
उन्मुक्त उड़ानों में खोये, उच्छ्वास कहाँ ले पाता है।

सौहार्द्र कहाँ करुणार्द्र बिना, बेईमानों में खो जाता है,
बह आह करुण जीवन्त मुखर, सोपान क्षितिज सकुचाता है।

बस दर्द घाव गम दर्दिल मन, सज ख्वाब घरौंदा भाता है,
कहँ रक्षा-बन्धन डोर बिना, निर्भीत कहाँ रह जाता है।

अधिकार मूल कहँ सर्व सुलभ, बन शूल दंश दे जाता है,
जो देश प्रगति नित निर्माणक, चहुँ विकास सुखद यश गाता है।

पर आज वही बिन गेह वसन, ख़ुद जन्म धरा पछताता है,
अभिलाष कहाँ अहसास सुखद, शिक्षार्थ सुपथ छिप जाता है।

बस वादों के मकड़जाल, फँस लोकतंत्र इठलाता है,
आतप्त हृदय दुख दर्द जख़म, बस अधरों में छिप जाता है॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥