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चलना हमें सिखा दे

हीरा सिंह चाहिल ‘बिल्ले’
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
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रचनाशिल्प:काफिया-दिखा, सिखा, सजा, निभा, बता, पता, गिरा, बुझा, इत्यादि। रदीफ़-दे, २२१ २१२२ २२१ २१२२

ऐ ज़िन्दगी के मालिक, इसकी डगर दिखा दे।
है रहगुज़र मगर तू, चलना हमें सिखा दे।

आगाज़ में खुशी पर, अंजाम दर्द का है,
सारा जहान तेरा, खुशियाँ यहाॅं सजा दे।

हर साँस जो चलाती, वो बस तुझे ही दिखती,
हमको दिखा कभी तो दस्तूर ये निभा दे।

हर एक ज़िन्दगी को दुनिया से उठ ही जाना,
कितना समय मुकम्मल, तूने किया बता दे।

धरती, गगन, समंदर, सब एक-एक ही हैं,
है तू भी एक ही तो, अपना भी कुछ पता दे।

माटी की प्यास बुझती, बूंदों से इस धरा में,
सूखे हैं बूंद बिन ही, बारिश भी कुछ गिरा दे।

तेरा ‘चहल’ भी प्यासा, है प्यार बिन जहां में,
अपने जहां में मालिक, हर प्यास तो बुझा दे॥

परिचय–हीरा सिंह चाहिल का उपनाम ‘बिल्ले’ है। जन्म तारीख-१५ फरवरी १९५५ तथा जन्म स्थान-कोतमा जिला- शहडोल (वर्तमान-अनूपपुर म.प्र.)है। वर्तमान एवं स्थाई पता तिफरा,बिलासपुर (छत्तीसगढ़)है। हिन्दी,अँग्रेजी,पंजाबी और बंगाली भाषा का ज्ञान रखने वाले श्री चाहिल की शिक्षा-हायर सेकंडरी और विद्युत में डिप्लोमा है। आपका कार्यक्षेत्र- छत्तीसगढ़ और म.प्र. है। सामाजिक गतिविधि में व्यावहारिक मेल-जोल को प्रमुखता देने वाले बिल्ले की लेखन विधा-गीत,ग़ज़ल और लेख होने के साथ ही अभ्यासरत हैं। लिखने का उद्देश्य-रुचि है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-कवि नीरज हैं। प्रेरणापुंज-धर्मपत्नी श्रीमती शोभा चाहिल हैं। इनकी विशेषज्ञता-खेलकूद (फुटबॉल,वालीबाल,लान टेनिस)में है।