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जंगल के हम हैं फूल

डॉ.जयभारती चन्द्राकर भारती
गरियाबंद (छत्तीसगढ़)

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जंगल के हम हैं फूल’
सदा हँसते और लहलहाते हैं
ना हमें खाद की जरूरत,
ना हमें ही नित पानी चाहिए
बिना किसी देखभाल के,
दिखते हैं कितने सुन्दर।
जंगल के हम हैं फूल…

ना किसी का संरक्षण,
ना ही किसी का दुलार
फिर भी हम जी लेते हैं,
अपनी जीवन बार।
जंगल के हम हैं फूल…

जंगल पथ की शोभा हम,
राहगीर मुग्ध होते हम पर
तोड़ हम जंगली फूलों को,
पथ के साथी बना,दूर तक ले जाते।
जंगल के हम हैं फूल…

हम बन शोभा न घर की,
जंगल में ही ठिठौली कर तोड़
छोड़ जाते,बिलखते हमको,
मसल रौंद जाते पथ पर।
जंगल के हम हैं फूल…

साहस नहीं घर ले जाये,
घर आँगन की शोभा बनाये
एंकात जंगल का रास्ता,
संग पूर्ण करता हर कोई।
जंगल के हम हैं फूल…

भूले से साथ हमको,
चलने को कहता न कोई
हमारी इरादों,चाहतों पर,
शर्त रखता कोई।
जंगल के हम हैं फूल…

पथ के राही लौट फिर आयेंगे,
कह विदा हो जाते क्षण में
तकती आँखें देखा करती,
पीड़ा-दुःख,आँसूभर,मुस्कुराया करती।
जंगल के हम हैं फूल…

यही नियति नहीं,जीवन में फूलों की,
शीघ्र ही समझ जाती हैं हम
रखवाला तो नियंता है हमारा,
इस अदभुत सृष्टि के हम हैं फूल।
जंगल के हम हैं फूल…

राहगीर का क्या अस्तित्व है जग में,
फूलों का अस्तित्व है अमर कहानी
चाहे जंगल के फूल,बगीचे की शोभा,
मुस्काना ही जीवन है।
हम फूलों का बस यही कहना है,
जंगल के हम हैं फूल…॥

परिचय-डॉ.जयभारती चन्द्राकर का साहित्यिक उपनाम `भारती` है। जन्म १८ जनवरी १९६९ को रायपुर(छत्तीसगढ़) में हुआ है। वर्तमान में आपका बसेरा गरियाबंद (छग) स्थित सिविल लाईन में और स्थाई पता मठपारा,रायपुर है। हिन्दी,अंग्रेजी और छत्तीसगढ़ी भाषा जानने वाली भारती ने एम.ए.(हिन्दी), एम.एड.,एम.फ़िल(भाषा विज्ञान) एवं पी-एच.डी(हिन्दी)की पढ़ाई की है। कार्यक्षेत्र-प्राचार्य (शासकीय नौकरी) का है। इनकी लेखन विधा-गीत, कविता,लेख,लघु कथा,कहानी सहित नाटक, प्रहसन,संस्मरण आदि है। छत्तीसगढ़ी गद्य लेखन(एक परिचय, प्रथम संस्करण) प्रकाशित है तो डॉ.सत्यभामा आड़िल के छत्तीसगढ़ी, गद्य साहित्य में स्त्री विमर्श(प्रथम संस्करण),शहीद के गांव (छत्तासगढ़ी कहानी संकलन) आपके खाते में है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित होती हैं। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में आपको राज्य स्तरीय छत्तीसगढ़ी कहानी (पारंपरिक लोककथा लेखन प्रतियोगिता २००९) में प्रथम पुरस्कार,प्रतिभा सम्मान कवर्धा (छ.ग.) और छत्तीसगढ़ी साहित्यकार (स्व.श्रीमती सुशीला देवी नायक सम्मान)राज्य स्तरीय साहित्यकार सम्मान २०१७ मिले हैं। ब्लॉग पर भी सक्रिय डॉ.चंद्राकर की विशेष उपलब्धि-गायन और शिक्षा के क्षेत्र में है। लेखनी का उद्देश्य-आत्म संतुष्टि एवं साहित्य में रूचि होकर साहित्य से समाज में बदलाव लाना है। आपके पसंदीदा हिन्दी लेखक-जयशंकर प्रसाद,महादेवी वर्मा, प्रेमचंद,गजानंद माघव मुक्तिबोध, निराला और पंत हैं। जीवन में प्रेरणा पुंज-माता-पिता स्व.स्नेहलता चन्द्रा-श्याम लाल चन्द्रा,स्व.के. चन्द्राकर, और साहित्यकार डॉ.शैल चन्द्रा है। विशेषज्ञता-हिन्दी साहित्य एवं भाषा साहित्य तथा छत्तीसगढ़ी साहित्य एवं भाषा की है। देश व हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“मेरा देश भारत अनेकता में एकता,अखण्डता का है। धर्म निरपेक्ष एवं विश्व बंधुत्व की भावना से युक्त है। मुझे मेरे देश पर नाज़ है। मेरी जन्मभूमि हर बार भारत हो,यही मेरी अभिलाषा है। हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है। विशाल भारत में अनेक भाषाएं बोली और समझी जाती हैं,किन्तु कुछ हिन्दी भाषी राज्यों को छोड़कर अन्य राज्यों में यदि हम भ्रमण हेतु जाते हैं तब अपने ही भारत देश में हम पराया महसूस करते हैं। कन्नड़,तेलगु,मलयालम आदि भाषी राज्यों में हिन्दीभाषा न कोई समझता है,न कोई बोलता । यहाँ अंग्रेजी हम समझते-बोलते हैं,तो ठीक हैं अन्यथा राष्ट्रभाषा की विड़बंना दिखाई देती है। मुझे लगता है कि भारत के सभी राज्यों में हिन्दी भाषा अनिवार्य भाषा होनी चाहिए। इसका पठन-पाठन विशेष रूप में किया जाना चाहिए,तभी हम स्वतंत्र भारत में निर्भय होकर भ्रमण कर सकेंगे और अंग्रेजी भाषा की अनिवार्यता खत्म हो जायेगी।”