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जज़्बात और हालात

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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न जाने इस मुर्दों की महफिल में, जिन्दा इन्सान क्यों आ गए ?
भव के इस मरघट की चिता में तो, जिन्दों को भी जला गए।

जिन्दों में जज्बात हैं होते, मुर्दों को एहसास कहाँ होता है ?
मुर्दा मूक ही रहता है पर, जिन्दा तो हालात पे हँसता- रोता है।

दूसरों का दर्द तो दिखता न किसी को, अपने भी कहाँ रुलाते हैं ?
मय-मद में खो कर गली में पड़े-पड़े, मुर्दों से बेसुध हो जाते हैं।

कहाँ शर्म-धर्म और इज्ज़त- मान है?, यहाँ तो सभी ही नंगे हैं
तन उजले हैं कॉस्मैटिक से पर, भीतर से सबके सब गंदे हैं।

प्रदर्शित तो नेक सब दिखते हैं पर, सबके अवैध कई धन्धे हैं
पकड़े गए जो वही बस दोषी, बाकी तो सारे के सारे नेक बंदे हैं।

अब कहाँ रहा कोई जिन्दा जग में, किसमें रही अब पीड़ा है ?
बेदर्द तो मुर्दे ही होते हैं, आज सब कुछ स्वार्थ की ही क्रीड़ा है॥