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जरूरत है राजनीतिक परिष्कार की

ललित गर्ग
दिल्ली

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इन आम चुनावों में बड़े विरोधाभास दिख रहे हैं। एक बड़ा विरोधाभास है राजनीतिक घोषणाओं एवं आश्वासनों में,जो तमाम अंधेरों के बीच चांद उगाने की कोशिशें कर रहा है। इन सबके बीच आप और हम उन चार अंधों को मिले हाथी की तरह हैं,जो अपने मापदंडों के साथ अपना-अपना सच परखने में जुटे हैं कि इर्द-गिर्द जो घट रहा है,वह सही है या गलत ? अनेक प्रश्न जहन में उभर रहे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि क्या आज भी भारत में राष्ट्रीय भावना और देशभक्ति की भावना को मानकर नहीं चला जा सकता ? देश आज जितना विभाजित और संकीर्णता ग्रस्त है उतना शायद ही कभी रहा हो। अगर हम अपनी तुलना उन देशों से करें जहां आजादी संघर्ष के बाद हासिल की गई तो हम देख सकेंगे कि वहां बार-बार देशभक्ति के लिये सरकार को आह्वान नहीं करना पड़ता और जनता स्वयं सरकार की देशभक्ति को शंका की दृष्टि से नहीं देखती। बल्कि,यहां तो सेना की कार्रवाई पर ही प्रश्न खडे़ किये जा रहे हैं,सेना को राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है,यह न केवल विरोधाभास है अपितु विडम्बना भी है। राजनीतिक प्रदूषण एवं उसका आपराधिक चरित्र देश के समक्ष गम्भीर समस्या बन चुका है। इस मानसिकता में आचरण की पैदा हुई बुराइयों ने पूरे तंत्र और पूरी व्यवस्था को प्रदूषित कर दिया है। स्वहित और स्वयं की प्रशंसा में ही लोकहित है,यह सोच हमारी राजनीति में घर कर चुकी है। यह रोग राजनीति की वृत्ति को इस तरह जकड़ रहा है कि हर दल और नेता लोक के बजाए स्वयं के लिए सब-कुछ कर रहा है। भ्रष्ट आचरण और व्यवहार अब हमें पीड़ा नहीं देता। सबने अपने-अपने सिद्धांत बना रखे हैं,भ्रष्टाचार की परिभाषा नई बना रखी है। राजनीति करने वाले सामाजिक उत्थान के लिए काम नहीं करते,बल्कि उनके सामने बहुत संकीर्ण मंजिल है, ‘वोटों की।’ ऐसी रणनीति अपनानी है,जो उन्हें बार-बार सत्ता दिलवा सके। मत की राजनीति और सही रूप में सामाजिक उत्थान की नीति,दोनों विपरीत ध्रुव हैं। एक राष्ट्र को संगठित करती है,दूसरी विघटित। राजनीति शब्द को सुनते ही कानों में अंगुलियां डालने वालों को शायद मालूम नहीं कि यह उनके रक्त में ही नहीं,साँसों में भी समाई हुई है,जिन्दगी उसी से चलती है। हम जो हर दिन आँख खोलते और बन्द करते हुए चौबीस घंटे की जिन्दगी पूरी करते हैं,उसमें कुछ भी राजनीति से अछूता नहीं है। हम और हमारा जीवन राजनीति में ही लिप्त है और वही राजनीति आम चुनावों में यहां एक अलग तरह का माहौल पैदा कर रही है जिसमें राजनीतिक दल और राजनेता एक दूसरे को मर्यादाएं सिखा रहे हैं,एक तरह से राजनीति में दूसरे को मर्यादा का पाठ पढ़ाने का खेल चल रहा है, जबकि स्वयं की सीमा और संयम किसी को भी याद नहीं है। सिर्फ दूसरों की कमियों को गिनाना एक खतरनाक खेल है,अपनी अनदेखी करने की यह आदत भारतीय राजनीति की एक ऐसी विडंबना बनती जा रही है जो न केवल राजनीतिक दलों के लिए घातक है बल्कि राष्ट्र को भी कमजोर बना रही है। मर्यादाएं और संयम सबके लिए समान है और यही आदर्श स्थिति भी है। स्पष्ट है कि इन आम चुनावों में राजनीति के इस खेल में हर कोई दूसरे को यह दिखाने-समझाने में लगा है कि वह अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर रहा है। कोई यह नहीं देखना चाहता कि उसका स्वयं का पैर कहां है ? यह ऐसा खेल है जिसमें हर खिलाड़ी दूसरे की सीमा अपने ढंग से तय करता है। कोशिश यह दिखाने की रहती है कि दूसरा गलत खेल रहा है। अपने लिए तो सभी यह मानकर चलते हैं कि उनसे गलती हो ही नहीं सकती। हमारी राजनीति के इस चरित्र को समझने की जरूरत सिर्फ राजनेताओं को ही नहीं है, सामान्य नागरिकों के लिए भी है। संभवत: भारत के लोग इस खेल को समझने के साथ-साथ एक नये जिम्मेदारीपूर्ण अहसास को भी समझ रहे हैं। यह शुभ लक्षण है कि भारत में यह अहसास उभर रहा है कि तथाकथित राजनेता या ऊपर से आच्छादित कुछ लोगों की प्रगति देश में आनन्द और शांति के लिये पर्याप्त नहीं है,इसलिये नरेन्द्र मोदी जैसे संवेदनशील और स्वाभिमानी व्यक्तियों में राजनीति का एक नया अहसास अंकुरित हो रहा है जिसमें संघर्ष और निर्माण के तत्व हैं। इसमें संदेह नहीं कि किसी भी व्यवस्था में आचरण की सीमाएं हुआ करती हैं। व्यवस्था में रहने वालों को इन सीमाओं का आदर करना सीखना चाहिए,तभी व्यवस्था बनी रह सकती है। हमारे राजनेता एक-दूसरे को अपनी-अपनी मर्यादा का पालन करने की सलाह दे रहे हैं,तो इसमें कहीं कुछ गलत नहीं है। गलत तो यह बात है कि हर कोई दूसरे के आचरण पर निगाह रखना चाहता है,खुद को देखना नहीं चाहता। इससे अराजकता की ऐसी स्थिति बनती है जिसमें न साफ दिख पाता है और न ही कुछ साफ समझ आता है। राजनीतिक परिपक्वता और समय का तकाजा है कि हम दूसरों की ही नहीं,अपनी मर्यादाएं भी समझें और उनके अनुरूप आचरण करें। यह भी जरूरी है कि हम अपने को दूसरों से अधिक उजला समझने की प्रवृत्ति से भी बचें। हमें यह भी अहसास होना चाहिए कि जब हम किसी की ओर एक उंगली उठाते हैं तो शेष उंगलियां स्वयं की ओर ही उठती हैं। हम स्वयं को दर्पण में देखने की आदत डालें। पवित्रता का आदि बिन्दु है स्वस्थता। पवित्रता निरावरण होती है। आज राजनीति को पवित्रता की जरूरत है। पवित्रता की भूमिका निर्मित करने से पूर्व की भूमिका है आत्मनिरीक्षण। किस सीमा तक विकारों के पर्यावरण से हमारा व्यक्तित्व प्रदूषित है ?,यह जानकर ही हम विकारों का परिष्कार कर सकते हैं। परिष्कार के लिए खुद से बड़ा कोई खुदा नहीं होता। महात्मा गांधी के शब्दों में-‘‘पवित्रता की साधना के लिए जरूरी है बुरा मत देखो,बुरा मत बोलो,बुरा मत सुनो।’’ भगवान महावीर ने संयमपूर्वक चर्या को जरूरी माना है। पवित्रता का सच्चा आईना है व्यक्ति का मन,विचार,चिंतन और कर्म। इन आम चुनावों की एक बड़ी विडम्बना है कि इसमें कोई भी कद्दावर राजनेता नहीं है जो यह सीख दे सके कि सब वास्तविकता के आईने में स्वयं को देखें और अपनी कमियों को दूर करें। नैतिकता की मांग है कि सत्ता के लालच अथवा राजनीतिक स्वार्थ के लिए हकदार का,गुणवंत का,श्रेष्ठता का हक नहीं छीना जाए। राजनीति को शैतानों की शरणस्थली मानना एक शर्मनाक विवशता है,लेकिन कतई जरूरी नहीं कि इस विवशता को हम हमेशा ढोते ही रहें। अपराधियों को टिकट देना,उन्हें जिता कर संसद में लाना,उनकी हरकतों को नजरअंदाज करना आदि राजनीतिक दलों की विवशता हो सकती है,लेकिन देश के जागरूक एवं जिम्मेदार मतदाता की नहीं ?