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जिंदगी आखिर कहाँ हो तुम!

ममता तिवारी ‘ममता’
जांजगीर-चाम्पा(छत्तीसगढ़)
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पांच मंजिल,तीस कमरे,पांच हॉल
दस दालान,चार ओर से सीढ़ी,
दस बरामदे,सात आँगन
दो बगीचे पांच फुलवारी,
यह एक महल है…
पास ही तीन कमरा एक छोटा हॉल,
बिना सीढ़ी दालान आँगन
फुलवारी,बगीचे की एक झोपड़ी है…
महल में दो लोग रहते हैं…
मालकिन और कुत्ता
झोपड़ी में ग्यारह…
माँ-पिता के दो माँ-पिता,
चार अनब्याहे बेटा-बेटी
एक ब्याहा बेटा-बहू
एक ब्याहे बेटे का बेटा…।

महल की रसोई में,
कभी-कभी खिचड़ी
या दलिया बनते हैं…
झोपड़ी में सुबह से आधी रात तक
कुछ न कुछ बनते ही रहता है…
महल में पिन-ड्राप सन्नाटा रहता है…
घर में चौबीस घण्टे,चीख-झल्लाहट,
टी.वी.,म्यूजिक सिस्टम
और ब्याहे बेटे के बेटे का भोंपू,
बजता रहता है…।

झोपड़ी के लोग दिनभर महल में काम करते हैं,
इसलिए थके और बीमार रहते हैं…
महल वाली दिनभर काम नहीं करती,
इसलिए थकी और बीमार रहती है..
जीवन वहाँ भी नहीं…,
जीवन यहाँ भी नहीं…।
आओ पता लगाएं,
ये जिंदगी आखिर है कहाँ…!!

परिचय–ममता तिवारी का जन्म १अक्टूबर १९६८ को हुआ है। वर्तमान में आप छत्तीसगढ़ स्थित बी.डी. महन्त उपनगर (जिला जांजगीर-चाम्पा)में निवासरत हैं। हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाली श्रीमती तिवारी एम.ए. तक शिक्षित होकर समाज में जिलाध्यक्ष हैं। इनकी लेखन विधा-काव्य(कविता ,छंद,ग़ज़ल) है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैं। पुरस्कार की बात की जाए तो प्रांतीय समाज सम्मेलन में सम्मान,ऑनलाइन स्पर्धाओं में प्रशस्ति-पत्र आदि हासिल किए हैं। ममता तिवारी की लेखनी का उद्देश्य अपने समय का सदुपयोग और लेखन शौक को पूरा करना है।

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