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जीवन में ढालें वर्धमान को

ललित गर्ग
दिल्ली
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महावीर जयन्ती (४ अप्रैल विशेष)…

भगवान महावीर सामाजिक एवं व्यक्तिक्रांति के शिखर पुरुष थे। महावीर का दर्शन अहिंसा और समता का ही दर्शन नहीं है, बल्कि क्रांति का दर्शन है। उनकी क्रांति का अर्थ रक्तपात नहीं! अर्थ है परिवर्तन, जागृति! क्रांति अर्थात् स्वस्थ विचारों की ज्योति! क्रांति का अर्थ आग नहीं, सत्य और पूर्णता की ओर बढ़ना क्रांति है। जिसे वीर पुरुष सत्यपथ मानता है, उस ओर जिस समय वह अपने युग के समाज को भी आगे बढ़ाता है तब वह क्रांतिकारी कहलाता है। भगवान महावीर इस अर्थ में क्रांतिकारी थे। महावीर ने केवल धर्म तीर्थ का ही प्रवर्तन ही नहीं किया, बल्कि एक उन्नत और स्वस्थ समाज के लिए नए मूल्य-मानक गढ़े। उन्होंने प्रगतिशील विचारों को सही दिशा ही नहीं दी, बल्कि उनमें आए ठहराव को तोड़कर नई क्रांति का सूत्रपात किया। महावीर जन्म से महावीर नहीं थे। उन्होंने जीवनभर अनगिनत संघर्षों को झेला, कष्टों को सहा, दु:ख में से सुख खोजा और गहन तप एवं साधना के बल पर सत्य तक पहुंचे, इसलिए वे हमारे लिए आदर्शों की ऊंची मीनार बन गए। उन्होंने समझ दी कि महानता कभी भौतिक पदार्थों, सुख-सुविधाओं, संकीर्ण सोच एवं स्वार्थी मनोवृत्ति से नहीं प्राप्त की जा सकती, उसके लिए सच्चाई को बटोरना होता है, नैतिकता के पथ पर चलना होता है और अहिंसा की जीवन-शैली अपनानी होती है। महावीर जयन्ती मनाने हुए हम केवल महावीर को पूजें हीं नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को जीने के लिए संकल्पित हों।
महावीर ने जन-जन को समता के उपदेशामृत से आप्लावित ही नहीं किया, स्वयं के जीवन में जीया। वे जिस युग में जन्मे, उस समाज रूपी वट-वृक्ष को विषमता की विष वल्लरियां आवेष्टित कर चुकी थी। जाति और वर्ण के नाम पर वह बंटा हुआ था। वैभव और सम्पत्ति में केवल रुपए, सोना, चाँदी, जवाहरात ही नहीं, अपितु मनुष्यों को भी गिना जाता था। जब मनुष्य-मनुष्य के बीच भी इतनी विषमताएं समाज सम्मत थी, तब निरीह पशु-पक्षियों और सूक्ष्म प्राणियों की ओर ध्यान देना या उनके सुख-दुःख का अहसास करना समझ से बाहर की बात थी। इन्हीं स्थितियों में नारी उत्पीड़न, दास-प्रथा, जातिवाद आदि स्थितियों ने महावीर को उद्वेलित कर दिया। ऐसे विषमता एवं विसंगतियों भरे युग में क्षत्रिय कुंडलपुर के राजा सिद्धार्थ और महारानी त्रिशला के आँगन में एक तेजस्वी शिशु ने जन्म लिया। गर्भाधान के साथ ही बढ़ती हुई सुख-सम्पदा को देख बालक का नामकरण किया गया-वर्धमान, जिसके साए में था मानवता का प्यार-दुलार और समता का संसार। नन्हें शिशु के अबोले पर सक्षम आभामण्डल का ही प्रभाव था कि, पुत्र जन्म की बधाई देने वाली दासी प्रियंवदा को आभूषणों का उपहार ही नहीं मिला, पर महाराजा सिद्धार्थ ने सदा-सदा के लिए उसे दास्य कर्म से मुक्त कर दिया। जैन धर्म के अनुसार कोई भी तीर्थंकर अतिमानव अवतार के रूप में नहीं, अपितु सामान्य व्यक्तियों की तरह ही जन्म लेते हैं।
ऐसे ही महावीर के मन में शाही वैभव के प्रति कोई आकर्षण नहीं था। किसी गृहवासी को संन्यास की ओर ढकेलना उनका लक्ष्य नहीं था। वे व्यक्ति की शक्ति और रुचि के अनुसार उसे साधना की प्रक्रिया बताते थे। संसार के विरक्त व्यक्तियों को उन्होंने हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्मचर्य और परिग्रह से सर्वथा मुक्त रहने का उपदेश दिया, किन्तु जिनमें इतनी क्षमता नहीं थी, उन्हें हिंसा और परिग्रह को सीमित करने, परिहार्य असत्य और चोरी से बचने तथा विवाहित स्त्री और पुरुष के अतिरिक्त ब्रह्मचर्य का पालन करने की दिशा दिखाई। इससे असीमित भोग और संग्रह पर प्रतिबंध लग गया तथा निष्प्रयोजन होने वाली असत् प्रवृत्ति रुक गई।
महावीर जन्म से ही अतीन्द्रिय ज्ञानी थे। उन्होंने कहा_-“तुम जो भी करते हो-अच्छा या बुरा, उसके परिणामों के तुम खुद ही जिम्मेदार हो।” अपने ज्ञान से उन्होंने प्राणी मात्र में चैतन्य की धारा प्रवाहित होते हुए महसूस की। कभी-कभी वे अपने इर्द-गिर्द रहने वालों को इसकी अभिव्यक्ति भी दे देते। कभी किसी निरपराध या अभावग्रस्त व्यक्ति की दासता उनके कोमल दिल को कचोट जाती तो कहीं अहं और दर्प में मदहोश सत्तासीन व्यक्तियों का निर्दयतापूर्ण क्रूर व्यवहार उनके मृदु मानस को आहत कर देता। वे मानवीय संवेदना के गहरे चितेरे थे। महावीर घण्टों-घण्टों तक अपने समय की समस्याओं का समाधान पाने के लिए चिंतन की डुबकियों में खो जाते। ३० वर्ष की युवावस्था में सत्ता, वैभव और परिवार को सर्प कंचुकीवत् छोड़ साधना के दुष्कर मार्ग पर चल पड़े महावीर की १२ वर्ष से भी अधिक तक शरीर को भुला अधिक से अधिक चैतन्य के इर्द-गिर्द यात्रा चलती रही। ध्यान की अतल गहराइयों में डुबकियां लगाते हुए सत्य सूर्य का साक्षात्कार हुआ। वे सर्वज्ञ व सर्वदर्शी बन गए। इसी अनुभूत सत्य को आपने जन-जन तक पहुंचाने में उपदेशामृत की धार बहाई। वह अमृत सबके लिए समान रूप से था। उसमें जाति, वर्ण, रंग, लिंग, अमीर, गरीब की भेद-रेखाएं नहीं थी।
महावीर ने आकांक्षाओं के सीमाकरण की बात कही। उन्होंने कहा- मूर्च्छा परिग्रह है उसका विवेक करो। आज की समस्या है- पदार्थ और उपभोक्ता के बीच आवश्यकता और उपयोगिता की समझ का अभाव। उपभोक्तावादी संस्कृति महत्वाकांक्षाओं को तेज हवा दे रही है, इसीलिए जिंदगी की भाग-दौड़ का एक मकसद बन गया है- संग्रह करो, भोग करो। महावीर की शिक्षाओं के विपरीत हमने मान लिया है कि, संग्रह ही भविष्य को सुरक्षा देगा, जबकि यह हमारी भूल है। आज का संग्रह भविष्य के लिए कैसे उपयोगी हो सकता है ? क्या आज का संग्रह कल भोगा जा सकेगा, जब हमारी इंद्रियाँ अक्षम बन जाएंगी।
महावीर का दर्शन था खाली रहना। इसीलिए उन्होंने जन-जन के बीच आने से पहले, अपने जीवन के अनुभवों को बांटने से पहले, कठोर तप करने से पहले, स्वयं को अकेला बनाया, खाली बनाया। तप तपा। जीवन का सच जाना। फिर उन्होंने कहा-“अपने भीतर कुछ भी ऐसा न आने दो, जिससे भीतर का संसार प्रदूषित हो। यही खालीपन का संदेश सुख, शांति, समाधि का मार्ग है। दिन-रात संकल्पों-विकल्पों, सुख-दु:ख, तनाव का भार ढोना, ऐसी स्थिति में भला मन कब कैसे खाली हो सकता है ? इन स्थितियों को पाने के लिए वर्तमान में जीने का अभ्यास जरूरी है। जो आज को जीना सीख लेता है, समझना चाहिए कि, उसने मनुष्य जीवन की सार्थकता को पा लिया है और ऐसे मनुष्यों से बना समाज ही संतुलित हो सकता है, स्वस्थ हो सकता है, समतामूलक हो सकता है। जरूरत है उन्नत एवं संतुलित समाज निर्माण के लिए महावीर के उपदेशों को जीवन में ढालने की। ऐसा करके ही समाज को स्वस्थ बना सकेंगे। कोरे उपदेश तक महावीर को सीमित न बनाएं, बल्कि महावीर को जीवन का हिस्सा बनाएं, जीवन में ढालें।

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