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जीवन-संगीत

तारा प्रजापत ‘प्रीत’
रातानाड़ा(राजस्थान) 
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सम्पूर्ण सृष्टि के,
कण-कण में
बसा है भगवान,
साँसों की
लय ताल पर
चल रहा है इंसान।
हवाओं की सनसनाहट में,
भँवरों की गुनगुनाहट में
नदिया की कल-कल में,
चल और अचल में
दीपक की ज्योति में,
सीप के मोती में
जड़ और चेतन में,
जंगल और उपवन में।
मानव के मन में,
प्रकृति के कण-कण में
कोयल की कुह-कुह में,
पपीहे की पीहू-पीहू में
झूमती टहनियों में,
चमकती बिजलियों में
गरजते बादलों में,
हिरणों की चालों में।
तारों की टिम-टिम में,
बारिश की रिमझिम में
चूड़ियों की खन-खन में,
पायल की रुन-झुन में
चाँद की चाँदनी में,
राग और रागिनी में
मुरली की तानों में,
गूंजती अजानों में।
चिड़ियों के चहकने में,
फूलों के महकने में
मधुर-मधुर गीत में,
मन में बसी प्रीत में
सात सुरों की सरगम,
बजती है हरदम।
साँसों की लय पर,
चल रही है धड़कन।
जीवन संगीत और,
संगीत है जीवन॥

परिचय– श्रीमती तारा प्रजापत का उपनाम ‘प्रीत’ है।आपका नाता राज्य राजस्थान के जोधपुर स्थित रातानाड़ा स्थित गायत्री विहार से है। जन्मतिथि १ जून १९५७ और जन्म स्थान-बीकानेर (राज.) ही है। स्नातक(बी.ए.) तक शिक्षित प्रीत का कार्यक्षेत्र-गृहस्थी है। कई पत्रिकाओं और दो पुस्तकों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं,तो अन्य माध्यमों में भी प्रसारित हैं। आपके लेखन का उद्देश्य पसंद का आम करना है। लेखन विधा में कविता,हाइकु,मुक्तक,ग़ज़ल रचती हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-आकाशवाणी पर कविताओं का प्रसारण होना है।

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